बुधवार, 6 जनवरी 2010

डाकिया या कुरियर

डाकिया आता था
एक थैला लाता था
मोहल्‍ला जुटता था
जिज्ञासा और आशा के बीच
हरेक आनंदित होता था
डाकिया पता पूछता
तो हर कोई
घर तक छोड़ आने को तैयार होता था
अपने आप को धन्‍य समझता था
आज पहली बात तो
डाकिया नहीं आता
कोरियर आता है
वह पता पूछता है
तो कोई नहीं बताता
पड़ोस में कौन रहता है
कोई नहीं जानता
खुश होना तो दूर की बात है

सच में ये खुशियां दूर चली गयीं हैं अब
न डाकिया है, न उसका इंतजार है
शहरीकरण जो हो गया है
कोरियर वाला आता है
पर उसे डाकिया का दर्जा
कतई नहीं दिया जा सकता

3 टिप्‍पणियां:

  1. समय बदल गया है भाई!!


    ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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  2. सही कहा डाकिया परिवार का सदस्य होता है
    कूरियर परिजीवी

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  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं

टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट