रविवार, 5 जून 2011

रामदेव बाबा और व्‍यंग्‍य लेख

कपाल-भाती या कमाल-भाती

एक हैं अण्णा हजारे, भ्रष्‍टाचार के तालाब में खूब पत्‍थर मारे। उनसे उठी लहरें अभी शांत भी नहीं हो पायीं थी कि बाबा राम देव आ गये। आ गये और इस कदर छा गये कि वर्तमान सरकार के चार मंत्री आनन फानन में अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंच गये। वहां क्‍या हुआ, पता नहीं पर एक बात जो हमने जानी, वो ये कि इन्‍होंने जीवन भर योग मुद्राएं सिखायीं और जनता ने सीखीं। देश के आलाओं ने जरा उलट सीख लीं...। इन्‍होंने ‘ योग की मुद्राएं ’ की जगह ‘ मुद्राओं का योग ‘ सीख डाला। अब कोई इनसे पूछे कि यह मामला थोड़ा उलट ही तो हुआ है। इसमें इतनी हाय तौबा की क्‍या जरूरत है। आपने ही सिखाया है तोंद में हवा भरो और निकालो। कुछ ने भरी और निकाली। कुछ ने सिर्फ भरी और निकाली ही नहीं। ये उनकी तौंद का माद्दा है। अब अन्‍ना हजारे चाहते हैं कि जिस पंप से तौंद फुलाई है उसी में पंचर हो जाए...और आप चाहते हैं कि तौंद ही पंचर कर दी जाए। दोनों पहले से सलाह मशविरा कर लेते तो अच्‍छा रहता न । आलाओं ने बड़े जतन से पाला है...आसानी से कैसे पंचर कर दें।

आपने अपने खिलाफ निर्णय लिया है कभी...? कहावत आ बैल मुझे मार के बजाय लोग तो नयी कहावत बना चुके हैं कि जा बैल उसे मार। लोग अपने पैर पर कभी कुल्‍हाड़ी नहीं मारते हैं और आप कह रहे हैं कि आलाओं आओ और कुल्‍हाड़ी पर पैर मारो... कैसे संभव है...? कौन चाहेगा लहूलुहान होना । मरीज खुद इंजेक्‍शन नहीं लगा पाता और जब लगावाता है तो मारे डर के मुंह फेर लेता है। फिर आप कैसे उम्‍मीद करेंगे की मरीज अपने फोड़े में चीरा भी खुद लगा ले। ये योग से तो होता नहीं है और इस चीर-फाड़ को करने के लिए मरीज को बेहोश करना पड़ेगा, या फिर उतने अंग का पीर-हरण करना या सुन्‍न करना लाजमी है। तभी मुद्राओं के योग का चीर-हरण हो सकेगा। वैसे सरकार की हालत कुछ ऐसी हो गयी है, जैसे पित्रत्‍व की जांच में फंसे तिवारी जी की हो रही है, कि जांच के लिए खून दें या न दें। बड़ा कष्‍टकारक है। कोई इनके दर्द को समझेगा तब न। किसी की पीड़ा कोई क्‍यों समझे....।

यह महाभारत कालीन शब्‍द चीर-हरण पहले दुष्‍कृत्‍य माना जाता था। यह एक महासंग्राम का कारण बन गया था। जहां उसने कौरवों को पराजय का स्‍वाद चखवाया, वहीं पाण्‍डवों को उनका राज सिंहासन दिलवाया। यहां भी यही सब कुछ हो सकता है जो महाभारत काल में हुआ था, पर ये चीर-हरण हो तो सही...। अब ये चीर-हरण द्रोपदी का न होकर भारतीय मुद्रा का होना चाहिए। किस-किस के पास कितनी ढकी-दबी रखी है। भेद खुलना ही चाहिए। और मजे की बात है कि इस चीर-हरण को दुष्‍कृत्‍य नहीं, सुकृत्‍य कहा जायेगा। मैं सपने देख रहा हूं कि ऐसा सुकृत्‍य हो, या मेरा सपना, सपना ही रह जायेगा। काश कपाल-भाती के स्‍थान पर कोई नयी योगमुद्रा का विकास हो जाए जैसे कमाल-भाती।

पी के शर्मा

1/12 रेलवे कालोनी सेवानगर नई दिल्‍ली 110003

9990005904 9717631876

सोमवार, 30 मई 2011

मोबाइल के सीने में भी दर्द है। हां..............






मोबाइल का दर्द



बहुत लंबा हो गया जब इंतजार

आ गया मैं तार पर होकर सवार

खूब इज्जत थी मेरी भी शान थी

मेरी ट्रिन-ट्रिन भी सुरीली तान थी

था बदन बेकार सा काला कलूटा

दीखता था मैं तुम्हें अच्छा अनूठा


मैं पधारा जब तुम्हारे द्वार पर

हो गया लट्टू तुम्हारे प्यार पर

मान में चौकी किसी ने खाट दी

हर पड़ौसी ने मिठाई बांट दी


तुम से ज्यादा थे पड़ौसी साथ मेरे

ले लिए हों जैसे मुझसे सात फेरे

आ गया हूं, मैं नये अवतार में

अब नहीं जुड़ता किसी भी तार में


रह रहा हूं जेब में या हाथ में

अब मजा आता है यूं हर बात में

साथ देता हूं तुम्हारा हर कदम

तुम नहीं हो मेरे सच्चे हमकदम


खोपड़ी के बाल अपने नोच लो

एक शिकवा है हमें अब सोच लो

खूब उंगली पर नचाया था जिसे

अब अंगूठा क्यों दिखाते हो उसे

--------------

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

होली पर एक राज़ की बात। जानना चाहोगे ?

क्‍यों लगाते हैं गुलाल, होली में

बहुत पुरानी कहानी है; राजा हिरण्‍यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सगाई राजस्‍थान में बाड़मेर राज्‍य के एक अतिसुंदर नौजवान राजकुमार ईलोजी से तय कर दी। राक्षस जैसे सुंदर होने चाहिए वैसे ही थे, ईलोजी। खरबूजे जैसे गाल, आम की फांक जैसी आंखें, भैंसे जैसा शरीर, मटके का सा पेट और बेडौल शरीर का मालिक। राजकुमारी होलिका ईलोजी के इसी रूप पर मोहित हो गयी थी।

ईलोजी भी काली-कलूटी होलिका की सुंदरता का वर्णन सुनकर बेहद प्रभावित हो गया और शादी करने को राजी हो गया था। होलिका तपस्विनी भी थी। उसने तपस्‍या द्वारा अपना प्रभाव इतना बढ़ा लिया था कि उसका भाई हिरण्‍यकशिपु भी उसका बहुत सम्‍मान करता था और बड़ी-बड़ी राजनैतिक उलझनों में उससे सलाह लिया करता था। होलिका को बस एक ही दुख था। उसका रंग बिलकुल काला था। इसके विपरीत ईलोजी बेडौल पर, गोरा था। इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए होलिका ने अग्नि की उपासना की और अग्नि देवता से अग्नि जैसा दहकता और दमकता हुआ रूप मांगा। अग्नि देवता ने प्रसन्‍न होकर होलिका को वरदान देते हुए कहा- ‘ तुम जब चाहोगी, अग्नि-स्‍नान कर सकोगी और अग्नि-स्‍नान के बाद एक दिन और एक रात के लिए तुम्‍हारा रूप अग्नि के समान जगमगाता रहेगा’। अब तो होलिका की मौज आ गयी थी। वह नगर के चौक पर चंदन की चिता में बैठकर रोज अग्नि-स्‍नान करने लगी। इससे होलिका का रूप चलती-फिरती बिजली सा चमकने लगा था। ईलोजी अपनी भावी दुल्‍हन की तपस्‍या और रंग-रूप से बेहद प्रभाविता हो चुके थे।

वसंत ऋतु में होलिका ईलोजी के विवाह का दिन निश्चित हो गया था। ईलोजी दूल्‍हा बनकर बारात लेकर होलिका से विवाह के लिए चल दिये। बारात आनन्‍द-उत्‍सव मनाती, नाचती-गाती दुल्‍हन के घर पहुंचने वाली थी। इधर ये बारात आने वाली थी, उधर राजा हिरण्‍यकशिपु एक झंझट में फंस गया था। उसका अपना बेटा राजकुमार प्रह्लाद विद्रोही को गया था और उसके महान शत्रु विष्‍णु का भक्‍त बन बैठा था। एक ओर उसकी दुलारी बहन का विवाह और दूसरी ओर उसके अपने बेटे का विद्रोह तथा विष्‍णु के छल-बल से परेशानी का डर। हिरण्‍यकशिपु ने अपनी बहन से सलाह ली। होलिका.... मैं प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास कर चुका, लेकिन वह हर बार बच जाता है। इधर तुम्‍हारे विवाह में दो दिन शेष बचे है और बारात भी आने ही वाली है... मैं सोचता हूं, इस मंगल कार्य में प्रह्लाद के कारण कोई विघ्‍न न उत्‍पन्‍न हो जाए। भाई की परेशानी भांप कर होलिका बोली भइया... अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं आज शाम को जब अग्नि-स्‍नान करूंगी तो प्रह्लाद को भी गोद में लेकर बैठ जाऊंगी। सांप भी मर जायेगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। होलिका भाई की परेशानी को खत्‍म करने के चक्‍कर में ये भी भूल गयी कि अग्नि में प्रवेश से न जलने और सुरक्षित निकलने का वरदान सिर्फ अकेली के लिए था। किसी को साथ लेकर अग्नि-स्‍नान से क्‍या हो सकता है, इसके बारे में सोच ही नहीं रही थी। बस यही भूल उसकी मौत का कारण बन गयी। प्रह्लाद तो सुरक्षित बच गया पर होलिका जलकर राख हो गयी।

होलिका दहन के अगले ही दिन बारात दरवाजे पर आ पहुंची।

ईलोजी ने जब सुना कि होलिका अग्नि-स्‍नान करते समय जल मरी है, तो उसे बड़ा दुख हुआ। वे पागल से होकर होलिका की ठंडी चिता के पास जा पहुंचे और अपने दूल्‍हा वेश पर ही होलिका की राख हो मलने लगे और मिट्टी में लोट-पोट होने लगे। ईलोजी का सारा शरीर, मुंह और कपड़े राख में सन चुके थे। बारातियों ने उस पर पानी डालकर उसे धोने का प्रयास किया लेकिन ईलोजी नहीं माने और राख-मिट्टी में लोट-पोट होते रहे। ईलोजी का यह पागलपन देखकर बारातियों और नगर वासियों ने उसका मजाक बनाना शुरू कर दिया और हंसने लगे। किसी ने उसे रसिया कहा और उसके गले से फूलों की माला निकाल कर जूतो की माला डाल दी। ईलोजी ने अपनी प्रेमिका होलिका की याद में सब कुछ सहा और आजीवन कुंआरे रहने की कसम ले ली। तभी से ईलोजी फागुन के देवता कहलाने लगे। र्इलोजी के विवाह और होलिका दहन की याद में आज भी लोग होलिका दहन करते हैं। अगले दिन ईलोजी के साथ होने वाले हंसी मजाक को भी दोहराया जाता है। हां इतना जरूर है, राख के स्‍थान पर गुलाल का प्रयोग होने लगा है और पानी के स्‍थान पर रंग प्रयोग किया जाने लगा है।

राजस्‍थान में तो कई शहरों, गांव और कस्‍बों में आम चौराहों पर ईलोजी की प्रतिमाएं भी बैठाई जाती हैं और उन्‍हें दूल्‍हे की तरह सजाने और संवारकर रंग-गुलाल से पोतने की प्रथा है। ईलोजी हंसी-मजाज के प्रतीक बन गये हैं। राजस्‍थान में इनके नाम पर ईलोजी मार्किट, ईलोजी सर्किल, ईलोजी मार्ग और ईलोजी चौक से स्‍थानों का नामकरण कर उनको सम्‍मान दिया जाता है। ईलोजी के ही रूप में राजस्‍थानी रसिये दूल्‍हे के वेश में सजकर रंग-गुलाल से सने घोड़ी या गधे पर बैठकर धुलैंहडी के दिन गली चौराहों पर घूमते रहते हैं।

( साभार--- ऐतिहासिक कथाएं )

शनिवार, 12 मार्च 2011

हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन, परिकल्‍पना और नुक्‍कड़डॉटकॉम ने कमाल कर दिया


जी हां , हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के लिए एक सकारात्‍मक कदम हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन के साथ शिखर की ओर बढ़ चला है। विवरण जानने के लिए और अपनी राय व्‍य‍क्‍त करने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए। जानकारी का खजाना खुलेगा। कहा जा रहा है कि यह मील का पत्‍थर बनेगा। पर मेरा मानना है कि यह मीलों लंबी चट्टान बनेगी। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के स्‍वर्णिम युग की शुरूआत हो चुकी है।
आप सब पढ़कर, जानकारी हासिल करके, लौट कर वापिस इसी चौखट पर आइयेगा।

बुधवार, 26 जनवरी 2011

गणतंत्र की शुभकामनाएं

इस देश की माटी को, इस देश का किसान अपने पसीने से जितना भी सींचे कम है।
इस देश की माटी को, इस देश का जवान अपने लहू से जितना भी सींचे कम है।
इस देश की खाल को, इस देश का नेता जितना खींचे उतना ही गम है।
सभी देशवासियों को गणतंत्र की शुभकामनाएं......

शनिवार, 22 जनवरी 2011

आदर्श नगर में आयोजित मीडियाकर्मियों के लिए आयोजित हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग कार्यशाला को संबोधित करते हुये जैसा श्री अविनाश वाचस्‍पति जी ने कहा


साथियों नमस्‍कार।
आप सब क्राइम रिपोर्टर हैं । मेरा कहना है कि हिन्‍दी का प्रयोग न करने को देश में क्राइम घोषित कर दिया जाना चाहिए और आज मैं इस मंच से पूरा एक दशक हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के नाम करने की घोषणा करता हूं। इस एक दशक में आप देखेंगे कि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सबसे शक्तिशाली विधा बन गई है। जिस प्रकार मोबाइल फोन सभी तकनीक से युक्‍त हो गया है, उसी प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग सभी प्रकार के संचार का वाहक बन जाएगी।
मीडियाकर्मियों और हिन्‍दी ब्‍लागरों का समन्‍वयन अवश्‍य ही इस क्षेत्र में सकारात्‍मक क्रांति का वाहक बनेगा। जिस प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगर और मीडियाकर्मी एकसाथ मिले हैं, उसी प्रकार यह परचम सभी क्षेत्रों में लहराना चाहिये। प्रत्‍येक क्षेत्र में से हिन्‍दी ब्‍लॉगर बनें और अपने अपने क्षेत्र की उपलब्धियों को सामने लायें। हिंदी मन की भाषा है और इस भाषा की जो शक्ति है वो हिन्‍दी के राष्‍ट्रभाषा न बनने से भी कम होने वाली नहीं है।
तकनीक का ज्ञान बांटने से बढ़ता है। आप जो भी सीखें, उसे सबको सिखलायें। नुक्कड़डॉटकॉम पर हिन्दीटूल किट का लिंक‍‍ स्‍पैनशाट और इंस्‍टालेशन की पूरी प्रक्रिया के साथ उपलब्‍ध है।
ब्‍लाग विधा के संबंध में जिस कक्षा में कंप्‍यूटर शिक्षण आरंभ किया जाता है, उसी कक्षा से सभी विद्यार्थियों के लिए ब्‍लॉग शिक्षण केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों द्वारा अनिवार्य तौर पर लागू कर दिया जाना चाहिये। हिन्‍दी ब्‍लागिंग को पाठ्यक्रम में शामिल करने की महती आवश्‍यकता है।
प्रिंट मीडिया और चैनलों में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को अब जितनी प्रमुखता से लिया जा रहा है, वो इसकी शक्ति का प्रतीक है।
जब भी इंटरनेट खोलें तो अपने आवश्‍यक कार्यों की एक सूची बनाकर साथ रख लें और पहले उन कार्यों को निपटायें, उसके बाद बाकीकार्य करें। जिससे समय की बरबादी न हो और सभी कार्य भी पूरे हों सकें। यह सतर्कता प्रत्‍येक इंटरनेट प्रयोगकर्ता को बरतनी चाहिये।
इस प्रकार आपस में मेल मिलाप और मिलने मिलाने से जिम्‍मेदारी की भावना का विकास होता है और यही भावना हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को सार्थकता की ओर ले जाने में सक्षम है।
मुझे किसी का सहयोग करने के बाद धन्‍यवाद की अपेक्षा नहीं रहती है परंतु मैं चाहता हूं कि जो मैंने आपको सिखाया है, उसे आप अन्‍यों को अवश्‍य सिखायें। असली धन्‍यवाद और हिन्‍दी प्रेम यही है।
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग से जुड़ने पर सीधे से सबका पहला सवाल यह होता है कि क्‍या इसमें कमाई है, उन सबसे मेरा यह कहना है कि इसमें खूब कमाई है, अगर आप हरे लाल नीले नोटों में कमाई नहीं ढूंढ रहे हैं तो इसमें प्‍यार रूपी बेशुमार दौलत है। और इस दौलत का कोई सानी नहीं है। मुझे तो यह दौलत खूब मिली है और मैं इसी को सबसे बांट रहा हूं। मुझे जब कोई वस्‍तु बाजार से खरीदनी होती है, उस समय भी मैं एक पोस्‍ट डालकर सबकी राय और बहुमूल्‍य परामर्श ले लेता हूं जिससे समय और पैसे दोनों की बचत होती है। जो उसे पढ़ रहे हैं होते हैं, वे भी उससे लाभान्वित होते हैं। यह भी कमाई
हम घर में भाई को कोई काम कहते हैं तो वो कर देता है और हम उसके काम कर देते हैं। उसी प्रकार हिन्‍दी ब्‍लॉगर आपस में करते हैं, मुझे किसी जगह का कोई काम होता है तो मैं उस जगह के किसी भी ब्‍लॉगर को कह देता हूं और मेरा काम बिना जाये हो जाता है और इसी प्रकार मैं भी सबके काम करने के लिए सदा तत्‍पर रहता हूं। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होती है और यह भी कमाई का ही रूप है।
मैं आज पहली बार अनिल अत्री जी से मिला हूं, आप सबसे भी मिल रहा हूं परंतु कहीं से भी यह महसूस नहीं हो रहा है कि हम पहली बार मिल रहे हैं क्‍योंकि हम लोग आपस में नेट के जरिए रोज ही आपस में मिलते रहते हैं। यह हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की एक विशेषता है।
भाई खुशदीप सहगल इस अवसर पर लखनऊ जाने के कारण नहीं आ पाये परंतु उनका कहना है कि लोकतंत्र के इस पांचवे खंबे को मजबूती प्रदान करने की जिम्‍मेदारी हम सबकी है। हमें सबको लेखक बनने से पहले एक जिम्‍मेदार संपादक बनना होगा।
सबको अपनी रचनाएं अपनी संतान की तरह प्‍यारी होती हैं। उनमें सुधार के लिए आवश्‍यक है कि सिर्फ वाह वाही पर ध्‍यान न देकर, स्‍वस्‍थ आलोचनाओं पर गौर करें और अपने लेखन को विकास की राह पर बढ़ने दें। वाह वाही पर ध्‍यान देने से आत्‍ममुग्‍धता के शिकार होने से विकास बाधित होता है।
सिर्फ टिप्‍पणियों में न उलझें, एक दूसरे की स्‍तुति अथवा टांग खींची में न लगे रहें, वाद विवाद में न पड़ें, ईमानदारी को न छोड़ें, अपने लिखे को सर्वोत्‍तम न मानें, अपनी कमियों को सुनें, जानें, समझें और सुधारने के लिए सदैव रास्‍ते खुले रखें। अपना आधा घंटा नियम पूर्वक इस विधा के विकास के लिए लगायें जिस प्रकार आप भोजन करते हैं, स्‍नान करते हैं और रोजाना के आवश्‍यक कार्यों को करते हैं।
धन्‍यवाद

बुधवार, 12 जनवरी 2011

खटीमा ब्‍लागर मीट की दूसरी किश्‍त


होनी है यहां ब्‍लागर मीट
कोई कमी न रह जाए।
हर तरफ नजर है मयंक जी की
दिशा निर्देशों के साथ हैं व्‍यस्‍त
मस्‍त और अलमस्‍त

ये सभी ठोक रहे हैं कील
जी हां, कील नहीं मील का पत्‍थर है ये
दीवार पर पोस्‍टर नहीं लग रहा....
पूरे विश्‍व में चमकेगा
बनाएगा अपनी शान और पहचान

हंसते रहो, हंसाते रहो
इस नेक ख्‍याल के जन्‍मदाता हैं ये
अपनी कथनी को सार्थक बना रहे हैं
आप भी शामिल हो जाइये इनके साथ
चलिए कल फिर मिलेंगे............

सोमवार, 10 जनवरी 2011

ब्‍लागर मीट खटीमा

जिसमें ब्‍लागश्री श्री पद्म सिंह कुछ खोज रहे हैं,
जी हां यही तो है,
इसी कार में सवार
पांच ब्‍लागर मजेदार
जा पहुंचे रूपचंद जी के द्वार
मयंक जी की महिमा का खटिमा
या कहें - खटीमा की महिमा
हीटर की गरमाई में
एक कविगोष्‍ठी रजाई में
संपन्‍न होती रही
दुनिया सोयी नहीं
जगती रही
सुनती रही
गुनती रही।
जी हां यही है
वह यंत्र
जो यत्र तत्र सर्वत्र
प्रसारित करता रहा
प्रचारित करता रहा
गोष्‍ठी का हर पल प्रतिपल
और अंतर्जाल की दुनिया निहारती रही अपलक
ब्‍लागरों की हर झलक
हम आभारी हैं श्री बिल्‍लोरे जी के
दोस्‍ताना निभाते रहे
और सारा नजारा दुनिया को दिखाते रहे
ये सब हुआ है पहली बार
अब तो होगा बारंबार
इससे अगली खबर
पर रखिये नजर
कल छपेगी यहीं पर
जी हां चौखट पर ...........................