शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

बताओ तो कौन हूं ।

मैं बेकरार रहा
हमेशा इंतजार रहा
तुम कब आओ
अपने कोमल स्‍पर्श से जगाओ
सिहरन सी होती थी बदन में
ऐसा जादू था तेरी छुवन में
होता था हर नाड़ी में रक्‍त संचार
ये ही तो था, तेरा और मेरा प्‍यार
कभी कभी तो मैं ही शौर मचाता था
तुम्‍हें बुलाता था
जब जब मैंने तुम्‍हारे कान में फुसफुसाया
तुम्‍हारा भी तन मन हर्षाया
चहक उठी काया

सुख भी गम भी
तुम भी हम भी
मिलकर सहते रहे
एक दूसरे के मन की बात कहते रहे
मुझे याद है
तेरे नर्म नर्म हाथों की
नर्म नर्म उंगलियों के
नर्म नर्म पोरों
के इशारों
पर नाचता रहा
चक्‍कर घिन्‍नी काटता रहा
प्रेम-पीड़ा बांटता रहा
तेरे गुलाबी होठों से निकली
गर्म सांस का एहसास
रहा हमेशा ही पास
तुमने जब जो चाहा
बेबाक कहा
मैं चुपचाप सुना करता था
ऐसा नहीं कि मैं डरता था
मैं तुम्‍हारी हर बात मान गया
और धीरे धीरे
तुम्‍हारे सब भेद जान गया
तुम कहां कहां बतियाए
किसे पुकारते हो
किसे पुचकारते हो

लेकिन ये जो जमाना बदल रहा है
तुम्‍हें भा रहा है मुझे खल रहा है
तुम्‍हारे जीवन में कभी भी
एक नया दोस्‍त आ जाता है
दुखद ये है कि
मुझसे ज्‍यादा भा जाता है
वो तो मेरे अस्तित्‍व को घुन लगा रहा है
मैं आता था तो घंटी बजाता था
वो तो नई नई धुन बजा रहा है
लेकिन तुम तो ऐसे ऐसों को जेब में रखते हो
कभी भी बदल देते हो
नये नये स्‍वाद चखते हो

आप सोचते होंगे मैं न जाने कौन से
रोमांस की चर्चा में रंग गया
लीजिए ससपेंस का सिलसिला थम गया
बता देता हूं मैं कौन हूं
जी हां
मैं आपका लैंड लाइन फोन हूं

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सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट