शनिवार, 9 मई 2009

बीत गया वो जमाना

डाकिया आता था

एक थैला लाता था

मोहल्‍ला जुटता था

जिज्ञासा और आशा

के बीच हरेक आनंदित होता था

डाकिया पता पूछता तो हर कोई

घर तक छोड़ आने को तैयार होता था

अपने आप को धन्‍य समझता था

आज

पहली बात तो डाकिया नहीं आता

कोरियर आता है

वह पता पूछता है

तो कोई नहीं बताता

पड़ोस में कौन रहता है

कोई नहीं जानता

खुश होना तो दूर की बात है

सच में ये खुशियां दूर चली गयीं हैं

अब न डाकिया है, न उसका इंतजार है

शहरीकरण जो हो गया है


कोरियर वाला आता है
उसे डाकिया का दर्जा कतई नहीं दिया जा सकता


2 टिप्‍पणियां:

  1. माना जमाना बीत गया है
    कोरियर आगे बढ़ गया है
    डाकिया पीछे छूट गया है
    कोई खुशियां लूट गया है

    पर अब मिलती है खुशी
    एम एम एस में ही जी
    मोबाइल की मिस काल में
    ब्‍लॉग पोस्‍ट में टिप्‍पणी में।

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  2. सही है .. स्‍थायित्‍व के न होने से ही कूरियरवाले को डाकिया नहीं माना जा सकता .. अब फोन के साथ ही साथ जीमेल , याहू आदि डाकिया बन गए हैं।

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट