शनिवार, 12 मई 2012

जरा कल्‍पना कीजिए ..........



आबादी घटायेंगे तो रिश्‍ते भी घट जायेंगे 




देश के भविष्य का वास्ता देकर एक नारा दिया गया था ...... दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे । इस पर देश वासियों ने अमल किया भी, नहीं भी । कारण कुछ भी रहे हों, तीन बच्चे... अच्छे होते तो थे.... पर घर में, सफर में नहीं । अब नारा देने वालों ने मुसीबत कम करने में मदद की और दूसरा सीधा सपाट सा नारा ठोंक दिया... हम दो, हमारे दो । जी हां,  हम दो,  हमारे दो । इसके बाद, चैन से सो...हरकत बंद,  तीसरे पर प्रतिबंध । यह नारा कुछ ठीक लगा । सफर में रंग रहे । दो बच्चों का संग रहे । मियां बीवी के गिले शिकवे समाप्त । परिवार की इस मिली-जुली उपलब्धि को फिफ्टी-फिफ्टी बांट कर चलो मजे से,  सफर हो या सैर सपाटा । परिवार,  न बढ़ा,  न घटा । जनसंख्या भी जहां की तहां । मगर मेरे देश के लल्लुओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी और बड़े परिवार को संभालने में चारा तक खा गये । नतीजा..... नारा,  न रहा ।
लेकिन हमारी तरफ से नारा देने वालों को थैंक्यू । क्योंकि जनसंख्या पर इसी नारे से पूर्ण विराम लग सकता था लेकिन उनको तो देश की भलाई,  जनसंख्या रोकने के बजाय,  घटाने में नजर आ रही थी । सो भई उन्होंने जनसंख्या घटाने के लिए एक नया नारा जोड़ दिया । नारा देने की आदत जो ठहरी । नारा मिला ---
हम दोनों एक,  हमारा एक ।
नारा बड़ा असरदार लगा । असर दिखायेगा या नहीं, ये अलग बात है । अगर असर दिखाया तो जनसंख्या का ग्राफ शेयर मार्किट की तरह ओंधे मुंह गिरेगा । लेकिन इस बाउंसरी नारे को फैंकने से किन-किन रिश्तों की विकिट परमानैंट गिरेंगीं  ?  नारा देने वालों को हो न हो पर हमें इसका एडवांस में अफसोस है । क्योंकि .... इस नारे के इम्पलीमैंट होने से ... जीवन नीरस हो जायेगा । रसरंग नहीं होगा । ‘भास्‍कर वाला होगा’ । त्यौहार बेमजा होंगे । चलो ये भी सही, पर कुछ तो होंगे ही नहीं । क्योंकि कुछ त्यौहार रिश्तों की बैशाखियों पर खड़े हैं,  बैशाखी को छोड़कर । रिश्ते ढह जाएंगे, त्यौहार इतिहास के पन्नों पर रह जाएंगे । आप भी कल्पना करके देखिये ऐसे नवयुग की ।
शादी में दूल्हे के जूतों का अपहरण करने का रिवाज होता है । और इस क्रिया को सरअंजाम देती हैं साली जी । अब जब साली ही नहीं होगी तो क्या इस हरकत को सास करेगी ? और अगर कर भी देगी तो .... क्या और कौन सा लुत्फ आयेगा ?  दूल्हा मन मसोस कर रह जायेगा कि कोई जीजा जी कहने वाली ही नहीं है । अगर होती तो इस गाने का रिकार्ड बज रहा होता --
दुल्हन के देवर,  तुम दिखलाओ न यूं तेवर । पैसे दे दो, जूते ले लो ।
ये बात यहीं तक रहती तो भी गनीमत थी,  लेकिन... जीजा जी कहने....वाली तो दूर, वाला भी नहीं होगा । मतलब साफ कि साला नहीं । इट मींस बच्‍चे का मामा नहीं । शादियों में भात का रिवाज खत्म । हुआ न विवाह की एक रस्म का अंत ।
मामा-मामी नहीं तो भांजा भी नहीं । मामा-भांजे दोनों नहीं तो महाभारत नहीं । बी.आर.चैपड़ा खुजलाते थोबड़ा । मामा कंस और शकुनि,  न होंगे न मरेंगे । और आगे बढ़ो नुकसानदेह मसला है । भाई नहीं, तो रावण मरेगा ही नहीं । शायद राम को ही सीता वियोग में ....?  बहन नहीं,  भाई नहीं । रक्षाबंधन का बंधन समाप्त । भइया दूज का अवसान निश्चित । राखी बनाने वालों का धंधा चोपट । चलो एक फायदा तो होगा ही ननद भौजाई न होंगी न लड़ेंगी ।
चलिए आगे,  एक और सजा । भाभी नहीं तो होली बेमजा । कहते हैं --
सावन मीठा नहीं होता जब तक घेवर नहीं होता
बहू,  भाभी नहीं होती जब तक देवर नहीं होता
कौन गुदगुदायेगा देवर को ? कौन चहकाएगा भाभी को ? दीदी के दिवाने देवर, कुडि़यों को दाना नहीं डाल पायेंगे और न ही कोई देवर कह पायेगा .... भाभी तेरी बहना को माना, हाय रा........म, कुडि़यों का है जमाना ....। गांवों में प्रचलित एक लोकोक्ति आपने जरूर सुनी होगी ...
गन्ने से गंडेरी मीठी  सबसे मीठा राळा
भाई से भतीजा प्यारा सबसे प्यारा साळा
ऐसी लोकोक्तियां आप कभी व्यवहार में नहीं ला पाएंगे । लोकगीतों का भी सत्यानाश होगा....
सरोता कहां भूल आये प्यारे ननदोइया.....हम खो जाते है जिस-जिस रंगीन लोकगीत में,  सब खो जायेंगे अतीत में । एक हरियाणवी गीत -
जिज्जा तू काळा मैं गोरी घणी ।
न जीजा हों,  न सालियां हों....न गीतकार इस तरह के गीत कल्पना में ला पाएं । ओवर ऑल रिश्तों व त्यौहारों पर परमाणु बम का सा हमला होगा । मगर मित्रो ... जहां नुकसान होता है वहां कुछ लाभ भी होता है ।
लाभ सुनो .... दहेज प्रथा बिना प्रयास के समाप्त । दोनों परिवारों का सामान व पैसा एक ही घर और एक ही तिजोरी में । शादियां.....सस्ती और आसान । जनसंख्या का ग्राफ घटना शुरू । गरीबी समाप्त होने की तरफ और देश तरक्की की राह पर । दो-दो सास-ससुर के जत्थे, एक ही मियां बीवी के मत्थे । वरना बूढ़े-बुढि़या कहां जाएंगे ?  बहू, जलाई नहीं जा सकेगी । अगर जली भी, तो... दामाद का भी नंबर लगेगा । ईंट का जवाब पत्थर से मिलेगा ।
समस्याएं स्वतः हल होंगी । जिन्दगी सफल होगी । जमीन-जायदाद के पारिवारिक झगड़े नहीं होंगे । राजनीति में भाई-भतीजावाद नहीं होगा, पुत्रवाद या पुत्रीवाद को छोड़कर। क्या-क्या होगा, और क्या-क्या नहीं होगा ... कुछ आप भी सोच लेना .... मैंने क्या... ठेका ले रखा है सब कुछ सोचने, बताने का ? पर यदि ऐसी क्रांतिकारी शुरूआत वास्तव में होती है ... तो होने दीजिए ... इसी में भलाई है ।  मैं, ऐसे नवयुग का स्वागत करने के लिए पांचवे युग तक जीवित रहना चाहूंगा, जब हम ... अरबों से करोड़ों की तरफ लौट चलेंगे । ये मेरा इरादा है,  और आपका ? क्या खयाल है ? दादा जी बनना पसंद करोगे या नाना जी ?
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पी के शर्मा



6 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा हा कहां से शुरू किए महाराज और कहां कहां ले जा के पटके हैं । समस्या विकट है , घोर संकट है , दुनिया लंपट है , फ़िर भी झटपट है , पोस्टवा फ़टफ़ट है , आ टिप्पिया खटपट है । चलते हैं राम राम

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. लीक से हट कर लिखे गए इस गुदगुदाने वाले व्यंग्य को पढकर बहुत अच्चा लगा

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  4. hahahahahahah,phir to ghar ke hi bachhe kahenge chachaji ne 5G spectrum ghotala kar diya .hahah

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट