शनिवार, 26 जुलाई 2014

शहीदों के परिवारी सदस्यों को नमन


मातृभूमि की रक्षा से देह के अवसान तक
आओ मेरे साथ चलो तुम सीमा से शमशान तक।
सोये हैं कुछ शेर यहां पर उनको नहीं जगाना
टूट न जाए नींद किसी की धीरे धीरे आना

सैनिक का बलिदान अकेला नहीं है। उसके साथ उसके परिजन भी बलिदान करते हैं। शहीद का शव ताबूत में परिजनों के बीच आता है, कल्पीनाओं में मैं वहां खड़ा हूं और सोच रहा हूं……..काश इस शहीद को मैं आवाज दूं और ये जी उठे…..

चाहता हूं तुझको तेरे नाम से पुकार लूं,
जी उठो तुम और मैं आरती उतार लूं

धूल में मिला दिया घुसपैठियों की चाल को
गर्व से ऊंचा उठाया भारती के भाल को
दुश्मेनों को रौंदकर जिस जगह पे तू मरा
मैं चूम लूं दुलार से पूजनीय वो धरा
दीप यादों के जलाऊं काम सारे छोड़कर…
चाहता हूं भावनाएं तेरे लिए वार दूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

सद्भावना की ओट में शत्रु ने छदम किया,
तूने अपने प्राण दे ध्व स्त, वो कदम किया
नाम के शरीफ थे फौज थी बदमाश उनकी,
इसीलिए तो सड़ गयीं कारगिल में लाश उनकी
लौट आया शान से तू तिरंगा ओढ़कर…
चाहता हूं प्यार से तेरी राह को बुहार दूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

कर गयी पैदा तुझे उस कोख का एहसान है,
सैनिकों के रक्तो से आबाद हिन्दुवस्ता न है
धन्यय है मइया तुम्हातरी भेंट में बलिदान में,
झुक गया है देश उसके दूध के सम्माभन में
दे दिया है लाल जिसने पुत्रमोह छोड़कर…
चाहता हूं आंसुओं से पांव वो पखार दूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

लाडले का शव उठा बूढ़ा चला शमशान को,
चार क्या  सौ-सौ लगेंगे चांद उसकी शान को
देश पर बेटा निछावर शव समर्पित आग को,
हम नमन करते हैं उनके, देश से अनुराग को
स्वनर्ग में पहले गया बेटा पिता को छोड़कर…
इस पिता के पांव छू आशीष लूं और प्याोर लूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

पाक की नापाक जिद में जंग खूनी हो गयी,
न जाने कितनी नारियों की मांग सूनी हो गयी
गर्व से फिर भी कहा है देख कर ताबूत तेरा,
देश की रक्षा करेगा देखना अब पूत मेरा
कर लिए हैं हाथ सूने चूडि़यों को तोड़कर…..
वंदना के योग्य  देवी को सदा सत्का र दूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

रो पड़ी है ये जमीं आसमां भी रो दिया
एक प्‍यारी सी बहन ने भाई अपना खो दिया
ताकती राखी लिए तेरी सुलगती राख में,
न बचा आंसू कोई उस लाडली की आंख में
ज्यों  निकल जाए कोई नाराज हो घर छोड़कर…
चाहता हूं भाई बन मैं उसे पुचकार दूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

कौन दिलासा देगा नन्हीं बेटी नन्हें बेटे को,
भोले बालक देख रहे हैं मौन चिता पर लेटे को
क्या  देखें और क्या  न देखें बालक खोए खोए से,
उठते नहीं जगाने से ये पापा सोए सोए से
चला गया बगिया का माली नन्हें पौधे छोड़कर…
चाहता हूं आज उनको प्यानर का उपहार दूं, ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

अंत में पा‍कस्तिान को एक सलाह एक चेतावनी............

विध्वंंस की बातें न कर छोड़ आदत आसुरी
न रहेगा बांस फिर और न बजेगी बांसुरी
कुछ सीख ले इंसानियत तेरा विश्वं में सम्मान हो
हम नहीं चाहते तुम्हारा देश कब्रिस्ताान हो
उड़ चली अग्नि अगर आवास अपना छोड़कर
चाहता हूं पाक को आज फिर ललकार दूं।ए शहीद आ तेरी, मैं आरती उतार लूं

2 टिप्‍पणियां:

  1. जिस जगह पर शहीदों का गुणगान हो, ऐसी चौखट को मेरा सलाम।

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