गुरुवार, 21 अगस्त 2008

हम क्‍यों मरें

मैं था एक छोटा सा बच्‍चा। भूख लगी थी। मैं जिद कर रहा था खाना खाने के लिए। खैर, बड़ी बहन ने चूल्‍हा जलाया। आज की तरह गैस की व्‍यवस्‍था नहीं थी। चूल्‍हे में उपले ' गोसे ' फोड़ कर झीना लगाना और सुलगाना पूरा समय लेता था। भूख में इंतजार करना काफी कष्‍टकारी हो रहा था। जैसे ही पहली रोटी बेली जाने लगी तैसे ही एक बुरी खबर मिली बराबर वाले घर में हमारी बुढि़या ताई चल बसीं। बड़ी बहन ने तुरन्‍त चूल्‍हे से तवा उतार दिया और आग बुझा दी। इधर मैं जीवन मृत्‍यु के भेद से अनजान भूख को ज्‍यादा तरजीह दे रहा था और अपनी बड़ी बहन से जिद कर रहा था कि खाना दो। ज्‍यादा जिद करने पर मुझे डाट कर चुप करा दिया गया। यह घटना सिर्फ हमारे ही घर नहीं बल्कि पूरे गांव में किसी के घर भी खाना तब तक नहीं बना जब तक ताई जी का अंतिम संस्‍कार नहीं हो गया। घर के सभी सदस्‍यों ने मेरी भूख को बड़ी निष्‍ठुरता से तिरकृत कर दिया था। मुझे बड़ा अजीब सा प्रतीत हो रहा था। मैं ऐसे व्‍यवहार की आशा कर ही नहीं सकता था। खैर अब मुझे खाना कब मिला ये बाद में बता दूंगा अब दूसरी बात सुनिये।

मैं अब दिल्‍ली शहर में रहता हूं। एक दिन मैं अपने एक जानने वाले देव कुमार जी के यहां गया हुआ था। उनके यहां चाय पी ही रहे थे कि अचानक उनके पड़ोसी का देहांत हो गया। खबर मिलते ही उन्‍होंने पत्‍नी से कहा --
बेगम ऐसा करो जरा जल्‍दी से आलू के परांठे सेक दो, पता नहीं शमशान घाट में कितनी देर लगे। अभी तो इनके रिश्‍तेदार आएंगे।‍ फिर कहीं अर्थी उठेगी तब तक कौन भूखा मरेगा। मरने वाला तो मर ही गया। हम क्‍यों मरें।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सही फरमाया है
    वो तब था
    यह अब है
    आधुनिकता का करतब है
    भूख का नया सबब है
    सबब है या सबक है
    आंतडि़यों की लहक है
    बहुत आसान से शब्‍दों में
    बहुत लंबी बात दिल में
    मन में मानस में उतार दी
    ऐसी बातों की मन में लगी
    पड़ी है कतार जी।

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  2. Supt samvedna ke jine ki aadaat ho gai hai hum sabhi ko--aise drishya har jagah dikhenge.

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट