शनिवार, 30 अगस्त 2008

अंतिम इच्‍छा नेता की

निसदिन विनती करूं तुम्‍हारी, निसदिन तुमको ध्‍याऊं मैं
कर दो बेड़ा पार प्रभू फिर गीत तुम्‍हारे गाऊं मैं


आजादी पाने की खातिर अंग्रेजों से नहीं लड़ा था
मरने वाले थे आगे मैं सबसे पीछे दूर खड़ा था
आजादी मिलते ही हमने एक इलेक्‍शन तभी लड़ा था
संसद में आते ही फिर मैं कुर्सी खातिर खूब लड़ा था

लड़ता था, लड़वाता था, अब सबको खूब लड़ाऊं में
कर दो बेड़ा पार प्रभू फिर गीत तुम्‍हारे गाऊं मैं


जनता ने देकर वोटों से किस्‍मत की खिड़की खुलवा दी
पहले शासक की जमी जड़ें पल भर में जिसने हिलवा दी
धन्‍यवाद उस जनता को जिसने ये कुर्सी दिलवा दी
सत्‍ता रूपी मदिरा की दो घूंट मुझे भी पिलवा दी

पी पीकर ये घूंट मजे से फिर अपना हुक्‍म चलाऊं मैं
कर दो बेड़ा पार प्रभू फिर गीत तुम्‍हारे गाऊं मैं


हो जाये गर ऐसा ही मैं भवसागर से तर जाऊं
राजघाट और विजयघाट सा घाट एक बनवा जाऊं
सरकारी शमशान घाट पर अपना नाम लिखा जाऊं
अंतिम इच्‍छा है बाकी बस कुर्सी पर ही मर जाऊं

मरूं जेल में सड़ सड़ कर इस झंझट से बच जाऊं मैं
कर दो बेड़ा पार प्रभू फिर गीत तुम्‍हारे गाऊं मैं

2 टिप्‍पणियां:

  1. सरकारी शमशान घाट पर अपना नाम लिखा जाऊं
    अंतिम इच्‍छा है बाकी बस कुर्सी पर ही मर जाऊं

    मरूं जेल में सड़ सड़ कर इस झंझट से बच जाऊं मैं
    कर दो बेड़ा पार प्रभू फिर गीत तुम्‍हारे गाऊं मैं

    bhai waah...neta padhenge to sochenge ki unki ichchayen disclose kaise ho gayeen.

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट