रविवार, 18 जनवरी 2009

कचनार की कविता

दिल तुम्हारा था हमारी देह में
और अपना था तुम्हारे नेह में
बात उपमा की चली तो क्या बताएं
हर तरफ चर्चा हुई कचनार की

जब दुखों की धूप ने सोखा बदन
और उसको छू गई तपती पवन
आ गयीं लेकर तुम्हारी भावनाएं
लहलहाती डालियां कचनार की

कब न जाने कौन क्या कुछ कह गया
प्रेम का धागा उलझ कर रह गया
गुत्थियां खोलें तुम्हारी कामनाएं
औषधि का रूप ले कचनार की
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7 टिप्‍पणियां:

  1. जब दुखों की धूप ने सोखा बदन
    और उसको छू गई तपती पवन
    आ गयीं लेकर तुम्हारी भावनाएं
    लहलहाती डालियां कचनार की
    apki choukhat par aana achcha laga

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  2. दिल तुम्हारा था हमारी देह में
    और अपना था तुम्हारे नेह में
    बात उपमा की चली तो क्या बताएं
    हर तरफ चर्चा हुई कचनार की


    wah bahut sunder

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  3. वाह !! हर जगह कचनार !! बहुत सुंदर !!

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  4. बहुत सुन्दर रचना, पवन भाई. आनन्द आ गया. संपूर्ण प्रवाह में.

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  5. जब दुखों की धूप ने सोखा बदन
    और उसको छू गई तपती पवन
    आ गयीं लेकर तुम्हारी भावनाएं
    लहलहाती डालियां कचनार की

    बहुत सुंदर लगी यह पंक्तियाँ पवन जी

    उत्तर देंहटाएं
  6. जब दुखों की धूप ने सोखा बदन
    और उसको छू गई तपती पवन
    आ गयीं लेकर तुम्हारी भावनाएं
    लहलहाती डालियां कचनार की

    बहुत सुंदर लगी यह पंक्तियाँ पवन जी

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट