सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

भागते भूत की लंगोटी ही सही

मेरी समझ काफी समझदार है लेकिन एक बात समझ से बाहर है कि आदमी भागते भूत की लंगोटी ही सही... क्यों कहता है। पहली बात तो ये विवादास्पद है कि भूत होता भी है या नहीं।
वैसे लोकमान्यताओं के अनुसार भूत उन लोगों की भटकती आत्मा होती है जो लोग अपने जीवन की मझधार में यमदूतों के हत्थे चढ़ जाते हैं और यमराज उन्हें स्वीकारता नहीं। न तो उन्हें स्वर्ग में एडमीशन मिल पाता है और न ही नर्क में। इधर परिवार के सदस्यों को इस अजीबो गरीब समस्या पर विचार करने की फुरसत नहीं होती क्योंकि वे लोग उसके शरीर को आग को समर्पित कर बीमा कंपनी के चक्कर लगा रहे होते हैं। कहां मिलती है फुरसत।
विचारणीय विषय है जिनके पास अपना शरीर ही नहीं होता तो वह भागेगा कैसे। मान लो बिना टांगों के भागा होगा जैसा कि हमारे देश में अफवाहें भागती हैं। कुछ समय पहले एक काला बंदर गाजियाबाद में भागा करता था।
इससे पहले भी पूरा भारत ही बौराया था गणेश जी को दुग्धपान कराकर। भला जो मोदक प्रिय हो उसे दूध चाय से क्या लेना। लोगों की नादानी से नाली के कीड़े भी धन्य हो गये दूध में नहा धोकर।
अफवाहों की तरह माना कि भूत भी भाग रहा होगा। लेकिन भूत के पास टांग नहीं तो उसके बास लंगोटी कहां से होगी। होगी भी तो किस काम की। चलो माना कि होगी, तो एक सवाल उठता है - कि आदमी भूत की लंगोटी खींचने से इतना संतुष्‍ट क्यों। मेरी समझ से तो दो ही कारण हो सकते हैं, खुद को ढकना चाहता है या उसको नंगा करना चाहता है तथा दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो देखो ये नंगा हो गया। ये आदमी भी क्या गफलत में रहता है। जिसका तन ही नहीं उसको भी नंगा करने पर उतारू है।
तीसरी बात कहूं- लंगोटी खींचना कोई अचंभे वाली बात नहीं है। अचंभे वाली बात तो ये है कि जब भूत का तन नहीं होता तो भी आदमी न जाने क्या देखना चाहता है। क्या तन वालों को नंगा देखकर मन नहीं भरा है...। वैसे आदमी के लिए किसी की भी कहीं भी और कभी भी लंगोटी खींचना कोई बड़ी बात नहीं है। खींचता जो रहता है एक दूसरे की। फिर भूत क्या चीज है। गनीमत है भूत ही इस घटना का शिकार हुआ है, भूतनी बच गयी है।

वरना आदमी का भी क्या भरोसा। वैसे मैंने काफी मनन किया है इस कहावत के जन्मदाता के विषय में। न जाने क्या सोचकर उसने इस कहावत की रचना कर डाली। वैसे ये शोध का विषय तो है। लंगोटी की जगह पाजामा भी तो खींचा जा सकता था। बनियान खींचा जा सकता था, कमीज खींची जा सकती थी। लंगोटी पर ही क्यों नजरें टिकाईं आदमी ने।
हां, जिस चीज की ज्यादा जरूरत होती है उसी पर ज्यादा तवज्जो दी जाती है पर लंगोटी न हो तो भी पाजामे से काम चलाया जा सकता था। चाहे जो भी हो बात जम नहीं रही, कहावत भी नहीं। एक कहावत और है इस हमाम में सभी नंगे, आदमी शायद इसी कहावत को सही साबित करने पर आमादा हो।
आप भी सोचो, मैं भी सोच रहा हूं। हो सकता है आदमी ईर्ष्‍या के वशीभूत हो ऐसी हरकत करना चाहता हो। क्योंकि ईर्ष्‍या करना भी आदमी के शगलों में एक खास शगल है।

जिसकी होती नहीं काया वो भी नहीं बच पाया

3 टिप्‍पणियां:

  1. ye kahavat naa hoti to aap itani badi post kaise bhejte aur kahavaton ki bhi muramat karte rahen haan is kahavat ki jagah kyaa hona chahiye spasht nahi hua

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  2. सहमत।
    एक तो भूत जो सपने में भी दिख जाये तो आदमी के देवता कूच कर जाते हैं। फिर वह भागता हुआ, तो जरूरी है कि लंगोटी अपेक्षक को उससे तेज नहीं तो कुछ दूर तक तो उसके साथ दौड़ना पड़ेगा। फिर भूत की लंगोटी। उस कपड़े में कौन सा जादू छिपा है अरे कुछ चाहिये तो उसी से मांग लो जो डर कर भाग रहा है। जो खुद ही पता नहीं कितना पूराना है उसका वह वस्त्र कितना पूराना होगा और ऐसी चीज किस काम की। फिर जो इतना कुछ करने में सक्षम होगा वह इंसान तो हो ही नहीं सकता। भागने वाले की जाति-बिरादरी वाला ही हो सकता है।

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  3. कहावतें तो बहुत हैं चंदन जी

    उनकी खुशबू नहीं आ रही है आप तक

    आज तक,

    नंगा क्‍या धोये, क्‍या निचोड़े

    पर आप नंगों के पीछे क्‍यों भाग रहे हैं

    वैसे नेताओं को नंगा करना एक जनहितकारी
    दमदार कदम हो सकता है

    क्‍या विचार है आपका ?

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट