शुक्रवार, 13 मार्च 2009

बेलगाम पुलिसवाले 'आज के समाचार पत्र हरिभूमि में प्रकाशित'

पुलिस में बढ़ती रिश्‍वतखोरी की आदत से पुलिस आयुक्त परेशान हैं। लगाम लगाने की सोच रहे हैं। पुलिस वाले घोड़े होते तो लग जाती। बैल भी नहीं हैं जो नाथ देते। रिश्‍वत में पुलिस वालों का क्या दोष है। ये तो राष्‍ट्रीय शगल है।
वर्दी धुलवानी है, कलफ लगवाना है और प्रैस भी करानी है। अब जूता तो है नहीं कि किसी गरीब को लात मारकर चमका लिया जाए और पालिश का पैसा बचा लिया जाए। ये बात कमिश्‍नर साहब को कैसे पता चली होगी, ये जो जांच का विषय है। फिर भी अगर पुलिस वाले रिश्‍वत के लिए लपलपा रहे हैं, वो भी कलफ के लिए तो आयुक्त साहब क्यों कलप रहे हैं। इसका भी हमें पता है, चलिये बताते हैं-

अभी कुछ दिन पहले अखबारों में एक खबर आयी थी, शायद वही खबर पता चल गयी होगी। मुझे तो बड़ा खराब सा लगा जब भिखमंगो के पैसे गिनने की हिमाकत की गयी। एक सर्वे हुआ और रिपोर्ट आयी तो आंखें फाड़-फाड़कर देखना पड़ा जीरो गिनने के लिए। पता चला कि शहरों में भीख का धंधा करोड़ों में है। हो सकता है पुलिसिया रिश्‍वतखोरी का धंधा अरबों या खरबों में हो। हो सकता है आयुक्त साहब ने भी पुलिस का सर्वे कराया हो और जीरो गिने लिए हों। हो भी क्यों नहीं। भिखमंगे को तो एक या दो का सिक्का मिलता है। इक्का दुक्का कोई पांच या दस रुपये देता है, तब फीगर करोड़ों में है।

अब सोचो पुलिस है तो इज्जत का कूड़ा थोड़े ही करेगी, पचास या सौ से नीचे हाथ फैलाकर। वो जमाने चले गये जब दस में काम चल जाया करता था। वर्दी पर लगी फीतियों से तय होता है कि गांधी कितना बड़ा होगा। गांधी पीला होगा या लाल होगा। गांधी एक होगा या अनेक। वैसे गांधी चाहे जैसा हो इन्होंने गांधी के नाम को रोशन तो किया। हां, इतना जरूर है कि ये धंधा भीख जितना गंदा नहीं है। रिश्‍वतखोरी में कम से कम शान तो है। बड़े-बड़ों ने
शान से ली है। लेने देने से नाम होता है, काम होता है या नहीं ये कम से कम मुझे तो नहीं पता। हां इतना अवश्‍य पता है कि रिश्‍वतखोरी की जांच में शायद रिश्‍वत से कई गुना पैसा खर्च हो जाता है।

वैसे वित्तमंत्री भी नहीं जानते होंगे, जितना सड़क किनारे खड़ा खोमचे वाला जानता है कि देश की अर्थव्यवस्था कहां से कहां तक व्यवस्थित है। मुद्रा का प्रसार किस प्रकार हो रहा है। इस प्रसार में भी एक सार है। इसको कर में लेने पर आयकर नहीं लगता।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपके लिखने का अंदाज पसंद आया. "गाँधियों और जीरो की गिनती" बहुत निराली लगी. रिश्वत और भीख माँगने में कुछ भी अंतर नहीं है. पुलिसवालों का पेशा रिश्वत ले-लेकर इतना बदनाम हो चुका है कि मुझे कोई पुलिस में नौकरी देगा तो भी नहीं लूँगा.

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  2. सटीक!! इसको कर में लेने पर आयकर नहीं लगता...बहुत सही!!

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  3. अनिल जी
    बदनामी से डर लगता है
    रिश्‍वत से तो नहीं लगता न
    बहुत से ऐसे पेशे हैं
    जिनमें रिश्‍वत तो है
    पर बदनामी नहीं है
    वहां नौकरी करोगे
    या अपना व्‍यवसाय।
    अपने व्‍यवसाय में देनी होगी रिश्‍वत
    जहां नौकरी करोगे वहां लेनी होगी रिश्‍वत
    न मिले रिश्‍वत ऐसी नहीं आएगी नौबत।

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट