रविवार, 15 मार्च 2009

नई दुनिया की खोज ' हरिभूमि में प्रकाशित '

झांको, खूब झांको। आदत से बाज नहीं आया करते। खुद कैसे हो इस बात पर गौर न करो। पड़ौसी कैसा है, इस बात पर ज्यादा ध्यान दो। पड़ौसी के पड़ौस में क्या चल रहा है, ये भी आपको पता होना चाहिए। अमेरिका को देखो न पड़ौसी के पड़ौसी के पड़ौसी को भी देख लेता है। ये जो दो-दो दीदे दिये हैं भगवान ने, ये दूसरों को देखने के लिए ही दिये हैं, खुद को देखने के लिए नहीं। खुद को देखने के लिए तो दर्पण भी बाद में आविष्‍कृत हुआ और हुआ भी तो झूठ बोलता है। लोग कहते हैं, दर्पण झूठ न बोले। पर बोलता है, बांये अंग को दांया बताता है। ऊपर का नीचे और नीचे का ऊपर बताने लगे, क्या भरोसा।
बात ताक-झांक की हो रही थी। दुनिया के वैज्ञानिक अंतरिक्ष में दूरबीन लगाकर झांक रहे हैं। देखना चाहते हैं कि कहीं और भी जीवन और सभ्यता है पृथ्वी के अलावा। नये जीवन और नयी सभ्यता की खोज हो रही है, जैसे यहां की सभ्यता कम पड़ गयी हो। सबका अपना अपना आसमान है, झांकने में क्या जाता है। मैं इन वैज्ञानिकों के अब तक के असफल प्रयास से कतई प्रभावित नहीं हूं। खांमखां अरबो फूंक रहे हैं। आने वाले समय में भी मुझे ये विषय निरर्थक लगता है। क्या कारण हैं ?
अपनी सभ्यता दिखाने के लिए कि देखो हम इंसानियत का कत्ल कितनी आसानी से कर देते हैं। जीवन के विनाश के सभी इंतजामात कर चुके हैं। परमाणु बम हो या रासायनिक हथियार। हम एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछने के लिए चिठ्ठी नहीं, मिसाइल भेजना चाहते हैं। हम देशवासियों का पेट काट-काट कर उसी की मौत का इंतजाम कर रहे हैं। किसी ने कहा है कि जीना है तो मरना होगा, सो इस सभ्यता का प्रयास है कि पहले भूखा मर, बच गया तो हथियारों से मर। आखिर जीवन का लक्ष्य ही तो मरना है। अंतरिक्ष वाले इस सभ्यता को देखकर गदगद हुए बिना नहीं रह पाएंगे।
इसके अलावा और भी कारण हो सकते हैं। क्यों ढूंढ़ रहे हैं नयी दुनिया, नई सभ्यता। शायद कुछ नया मिले। संभव है वहां सब कुछ पुराना ही दिखाई दे और कोई दूसरा अमेरिका इराक में जूता खाने की जिद कर रहा हो। अफगानिस्तान में मुल्ला उमर को उमर भर तलाशता फिर रहा हो। पाक में अपनी ही देन लादेन को देखने के लिए तरस रहा हो। हो सकता है उग्रवाद से त्रस्त कोई भारत भी नजर आये, जो अमेरिका की तरफ ताक रहा हो। हां...... क्या हुक्म है मेरे आका। मैं अपने पड़ौसी को देखूं या सुबूत ही दिखाता रहूं। अब तक जितने भी सुबूत दिये या दिखाये हैं, उन सभी से गिलानी जी को गिलानी हो रही है। और जरदारी साहब गरदन हिला हिलाकर कह रहे हों कि अमां मियां..... कसाब के अब्बा को तो, कोई औलाद हुई ही नहीं। और तो और कसाब की तो मां भी नहीं थी, तो उसका देश कहां से होगा। भारत को और ठोस सुबूत पेश करने होंगे। अब ये मसला ठोसियत पर टिका कर भारत को ठोसा दिखा दिया जाए, तो कोई अचंभा नहीं।
उस विशाल अंतरिक्ष में भारत पाक दिखें या नहीं, पर गनीमत है इस दुनिया में पाक ने आखिरकार माना है कि कसाब पाकिस्तानी है, भले ही दबाव में ही सही। बिना दाब के रस नहीं निकलता।
वैज्ञानिक नई दुनिया देखने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें देखने दो। नई दुनिया हमें देख रही है तो उसे भी देखने दो। हम तो अपने पड़ौसी को देख रहे हैं कि कब बिना दाब के सच को स्वीकारना सीखेगा।
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1 टिप्पणी:

  1. आज का हरिभूमि पूरा का पूरा झांक मारा

    कहीं पर चमकता नहीं दिखा यह सितारा
    जिक्र तो पड़ोसी का रोज ही होता है समझे

    बे-दाब सच न बोलने की सौगंध खाई उसने

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट