मंगलवार, 24 मार्च 2009

कटते हुए पेड़

मेरे घर के सामने विकास हो रहा है
इस विकास के नाम पर विनाश हो रहा है
नेहरू स्‍टेडियम और हमारे घर के बीच
एक सीमा थी
सीमा थी एक नाले की
इसकी काया पलट हो रही है
तमाम नीलगिरि के पेड़ धराशाई कर दिये गये
हो जाएं पेड़ धराशाई
न मिले पेड़ों की परछाई
लेकिन किसी ने नहीं विचारा
घोंसले टूटने पर कहां जाएगा
परिंदा बेचारा
लेकिन परिंदा बेचारा नहीं है
नकारा नहीं है
नया नीड़ बना लेगा
नई राह पा लेगा
कहीं और जाकर खा लेगा
पर अफसोस
मैं नहीं सुन सकूंगा
सुबह का कलरव
सुबह का कलरव
सुबह का कलरव

4 टिप्‍पणियां:

  1. hai....
    dard hain bhai....
    "main nahi sun sakoonga....
    subah ka kalrav...."

    apke blog main matrix ki jaisi sajavat bhi acchi lagi...

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  2. सही तो कहा है घोसला टूटने पर कहाँ जायेगा परिंदा बेचारा ...लेकिन परिंदा नहीं है बेचारा ........
    कितना खूबसूरत लिखा है

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  3. परिंदो को भी दिक्‍कत आएगी ... आपकी समस्‍या तो अपनी जगह है ही।

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  4. आप जो रहे हैं सोच
    कि कानों को सिर्फ नहीं सुनाई देगा
    सुबह का कलरव
    पर इससे भी अधिक
    आंखों को नहीं दिखाई देगी हरियाली
    नाक को ऑक्‍सीजन मिश्रित हवा की आहट
    सीमा सिर्फ यही नहीं हट रही है
    सीमाएं सारी डर के मारे पलट रही हैं
    पुरानी सीमा जा रही है
    नई सीमा आ रही है
    यही तो विकास का परचम है
    जिसे देश और आप फहराना चाहते हैं
    हम तो आप में और देश में समाहित हैं ही
    क्‍या आप नहीं चाहते कि
    सब चांद पर पहुंच जाएं
    चाहे वहां पर फिजा को न पाएं
    पर यहां की सीमा हटाएंगे
    तभी तो चांद के लिए नई सीमा लाएंगे

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट