गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

ढूढ़ों अपने कान में

अंक डंक रंक में गुडि़या जी की फ्राक में
कलियों में मुस्काता रहता देखो अपनी नाक में
सड़क किनारे रहता हूं मैं बीचों बीच मकान में
नहीं मिला तो अक्ल लड़ाओ ढूढ़ों अपने कान में

5 टिप्‍पणियां:

  1. ढूंढ रहा हूँ कान में...
    अपने बीच मकान में...
    कलियों की मुस्कान में..

    तब जाकर मिला: ’क’

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  2. @ सुनीता शानू


    फूलों को तो अपने
    चारों तरफ नजर आते हैं
    कांटे ही कांटे
    इसमें फूलों का कोई
    दोष नहीं।

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  3. "क"
    समीर जी ने पहले ही पहचान लिया।

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट