शनिवार, 19 सितंबर 2009

खो गया डाकिया

डाकिया आता था एक थैला लाता था
मोहल्‍ला जुटता था जिज्ञासा और आशा के बीच हरेक आनंदित होता था
डाकिया पता पूछता तो हर कोई घर तक छोड़ आने को तैयार होता था
अपने आप को धन्‍य समझता था
आज पहली बात तो डाकिया नहीं आता, कोरियर वाला आता है
वह पता पूछता है तो कोई नहीं बताता पड़ोस में कौन रहता है
कोई नहीं जानता खुश होना तो दूर की बात है
सच में ये खुशियां दूर चली गयीं हैं अब
न डाकिया है, न उसका इंतजार है
शहरीकरण जो हो गया है
कोरियर वाला आता है
उसे डाकिया का दर्जा
कतई नहीं दिया जा सकता

5 टिप्‍पणियां:

  1. ek satya ko ujagar kiya hai..........badhayi.
    ek prayas par aane ka shukriya...............kahani aage badh rahi hai padhkar bataiyega prayas ke bare mein. dhanyavaad.

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  2. मोबाइल इंटरनेट के ज़माने में कोरियर सर्विस के चलते डाकिये कम ही मिलते है . बिदास पोस्ट

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  3. प्ता नहीं अभी और क्या क्या खो जायेगा । धन्यवाद्

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  4. अब कहाँ वो डाकिया अब कहाँ वो खत ---
    अब कहाँ वो आँगन अब कहाँ वो छत ---

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  5. @ एम वर्मा

    वहीं आंगन वही है छत
    हाथ वही हैं कान वही हैं
    पर हाथ मोबाइल नई है।

    जो बची खुची हैं खुशियां
    वो इंटरनेट में समेट डालीं
    नेट पर ब्‍लॉग पुष्‍प और
    उस पर टिप्‍पणियां खुशबू
    देखो लबालब कर डालीं।

    इंतजार डाकिये का नहीं अब
    कंप्‍यूटर का करता है सब जग
    मेल नहीं ई मेल करता है चैक
    मेल चाहे फीमेल है नई गेल।

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टिप्‍पणी की खट खट
सच्‍चाई की है आहट
डर कर मत दूर हट