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आरकुट पर मेरा आज का भाग्य
यही बतला रहा है।
रविवार, 24 अगस्त 2008
गुरुवार, 21 अगस्त 2008
हम क्यों मरें
मैं था एक छोटा सा बच्चा। भूख लगी थी। मैं जिद कर रहा था खाना खाने के लिए। खैर, बड़ी बहन ने चूल्हा जलाया। आज की तरह गैस की व्यवस्था नहीं थी। चूल्हे में उपले ' गोसे ' फोड़ कर झीना लगाना और सुलगाना पूरा समय लेता था। भूख में इंतजार करना काफी कष्टकारी हो रहा था। जैसे ही पहली रोटी बेली जाने लगी तैसे ही एक बुरी खबर मिली बराबर वाले घर में हमारी बुढि़या ताई चल बसीं। बड़ी बहन ने तुरन्त चूल्हे से तवा उतार दिया और आग बुझा दी। इधर मैं जीवन मृत्यु के भेद से अनजान भूख को ज्यादा तरजीह दे रहा था और अपनी बड़ी बहन से जिद कर रहा था कि खाना दो। ज्यादा जिद करने पर मुझे डाट कर चुप करा दिया गया। यह घटना सिर्फ हमारे ही घर नहीं बल्कि पूरे गांव में किसी के घर भी खाना तब तक नहीं बना जब तक ताई जी का अंतिम संस्कार नहीं हो गया। घर के सभी सदस्यों ने मेरी भूख को बड़ी निष्ठुरता से तिरकृत कर दिया था। मुझे बड़ा अजीब सा प्रतीत हो रहा था। मैं ऐसे व्यवहार की आशा कर ही नहीं सकता था। खैर अब मुझे खाना कब मिला ये बाद में बता दूंगा अब दूसरी बात सुनिये।
मैं अब दिल्ली शहर में रहता हूं। एक दिन मैं अपने एक जानने वाले देव कुमार जी के यहां गया हुआ था। उनके यहां चाय पी ही रहे थे कि अचानक उनके पड़ोसी का देहांत हो गया। खबर मिलते ही उन्होंने पत्नी से कहा --
बेगम ऐसा करो जरा जल्दी से आलू के परांठे सेक दो, पता नहीं शमशान घाट में कितनी देर लगे। अभी तो इनके रिश्तेदार आएंगे। फिर कहीं अर्थी उठेगी तब तक कौन भूखा मरेगा। मरने वाला तो मर ही गया। हम क्यों मरें।
मैं अब दिल्ली शहर में रहता हूं। एक दिन मैं अपने एक जानने वाले देव कुमार जी के यहां गया हुआ था। उनके यहां चाय पी ही रहे थे कि अचानक उनके पड़ोसी का देहांत हो गया। खबर मिलते ही उन्होंने पत्नी से कहा --
बेगम ऐसा करो जरा जल्दी से आलू के परांठे सेक दो, पता नहीं शमशान घाट में कितनी देर लगे। अभी तो इनके रिश्तेदार आएंगे। फिर कहीं अर्थी उठेगी तब तक कौन भूखा मरेगा। मरने वाला तो मर ही गया। हम क्यों मरें।
शुक्रवार, 15 अगस्त 2008
आजादी या भविष्यवाणी
पुराने ज़माने के बच्चे, बच्चे नहीं थे
उनके संस्कार भी अच्छे नहीं थे
या उनकी नैतिक शिक्षा मैं कमी थी
या जहाँ वो जन्मे थे ज़हरीली ज़मीं थी
क्योंकि जो बात नेहरू ने -
पिछली सदी मैं कही थे
बिल्कुल सही थी
वरना कोई भी कैसे कह देता
आज के बच्चे, कल के नेता
उनके संस्कार भी अच्छे नहीं थे
या उनकी नैतिक शिक्षा मैं कमी थी
या जहाँ वो जन्मे थे ज़हरीली ज़मीं थी
क्योंकि जो बात नेहरू ने -
पिछली सदी मैं कही थे
बिल्कुल सही थी
वरना कोई भी कैसे कह देता
आज के बच्चे, कल के नेता
गुरुवार, 31 जुलाई 2008
हां आ गया मैं भी और मेरा लैपटाप भी हां आ गया मैं और मेरा लैपटाप भी
प्रिय मित्रो
मैं भी वायरल से दो दो हाथ कर रहा था
और मेरा लैपटाप भी
अब आज हम दोनों स्वस्थ हैं
दोनों एक दूसरे को देखकर मस्त हैं
अब फिर होगी मुलाकात
फिर होगी कुछ बात
बना रहे आपका प्यार
संपर्क बना रहेगा लगातार
बाकी कल
अब नमस्कार
मैं भी वायरल से दो दो हाथ कर रहा था
और मेरा लैपटाप भी
अब आज हम दोनों स्वस्थ हैं
दोनों एक दूसरे को देखकर मस्त हैं
अब फिर होगी मुलाकात
फिर होगी कुछ बात
बना रहे आपका प्यार
संपर्क बना रहेगा लगातार
बाकी कल
अब नमस्कार
गुरुवार, 17 जुलाई 2008
सर्वोत्तम विश्व मित्रता सप्ताह
अपने दुश्मन को मित्र बनाने के हजार अवसर दो लेकिन अपने मित्र को दुश्मन बनने का एक भी मौका मत दो।
यह विश्व मित्रता सप्ताह है।
इस संदेश को अपने सभी मित्रों को तो भेजे हीं, दुश्मनों को भेजना भी मत भूलें।
मुझे भी अवश्य भेजें।
यदि आपको 10 से अधिक उत्तर प्राप्त होते हैं तो आप लवेवल अवेलेवल इंसान हैं ......... मुझे इंतजार रहेगा ......
आपके प्यारे से मित्रता संदेश का सर्वोत्तम विश्व मित्रता सप्ताह के पावन अवसर पर।
यह विश्व मित्रता सप्ताह है।
इस संदेश को अपने सभी मित्रों को तो भेजे हीं, दुश्मनों को भेजना भी मत भूलें।
मुझे भी अवश्य भेजें।
यदि आपको 10 से अधिक उत्तर प्राप्त होते हैं तो आप लवेवल अवेलेवल इंसान हैं ......... मुझे इंतजार रहेगा ......
आपके प्यारे से मित्रता संदेश का सर्वोत्तम विश्व मित्रता सप्ताह के पावन अवसर पर।
बुधवार, 16 जुलाई 2008
द्रोपदी राजी हुई हर हाल में
गीत लिखें हैं सभी धर्मों ने कुछ
बंध न पाये हैं कभी सुर-ताल में
एक की पत्नी बने या पांच की
द्रोपदी राजी हुई हर हाल में
गलतियां किसने करी कैसे हुईं
मंदोदरी विधवा हुई हर काल में
हर बार देखी है बदल कर दोस्तो
कुछ न कुछ कंकड़ मिले हर दाल में
लाख चौकस हो रहे हैं हर कदम
कुछ न कुछ धोखा हुआ हर माल में
आ गये ऋतुराज भी हर बार ही
कोंपलें फूटी नहीं हर डाल में
खूब फैंको प्यार से मनुहार से
मछलियां फंसती नहीं हर जाल में
वोट देना है संभलकर दोस्तो
भेडिये दिखते हमें हर खाल में
बंध न पाये हैं कभी सुर-ताल में
एक की पत्नी बने या पांच की
द्रोपदी राजी हुई हर हाल में
गलतियां किसने करी कैसे हुईं
मंदोदरी विधवा हुई हर काल में
हर बार देखी है बदल कर दोस्तो
कुछ न कुछ कंकड़ मिले हर दाल में
लाख चौकस हो रहे हैं हर कदम
कुछ न कुछ धोखा हुआ हर माल में
आ गये ऋतुराज भी हर बार ही
कोंपलें फूटी नहीं हर डाल में
खूब फैंको प्यार से मनुहार से
मछलियां फंसती नहीं हर जाल में
वोट देना है संभलकर दोस्तो
भेडिये दिखते हमें हर खाल में
मंगलवार, 24 जून 2008
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