गुरुवार, 26 अगस्त 2010

ब्‍लॉगविद्या के बाबा रामदेव

डीएलए दिनांक 27 अगस्‍त 2010 के अंक में संपादकीय पेज 11 पर व्‍यंग्‍यकार डॉ. राकेश शरद।
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शनिवार, 14 अगस्त 2010

अंतिम इच्‍छा

आजादी पाने की खातिर अंग्रेजों से नहीं लड़ा था
मरने वाले थे आगे मैं सबसे पीछे दूर खड़ा था

देख रहा था मैं गोरों को वतन लूटते हैं कैसे
दौलत की लत कैसे पनपे कैसे बनते हैं पैसे

सीख रहा था नमक डालना जनता के हर घाव में
कसरत तो लाठी डण्‍डों से होती रही चुनाव में

जनता को बहकाया है बस झूठे झूठे वादों में
सारा जीवन बीत गया यूं दंगे और फसादों में

देख देख कर पारंगत हूं कैसे राज किया जाता है
भोली भाली जनजनता का कैसे खून पिया जाता है

हो जाए गर ऐसा कुछ मैं भवसागर से तर जाऊं
राजघाट और विजयघाट सा घाट एक बनवा जाऊं

सरकारी शमशान घाट पर अपना नाम लिखा जाऊं
अंतिम इच्‍छा है बाकी बस कुर्सी पर ही मर जाऊं

सोमवार, 26 जुलाई 2010

शहीदों के परिजनों को प्रणाम

मेरे ब्‍लॉग ' चौखट ' के पाठको के लिए खास

मातृभूमि की रक्षा से देह के अवसान तक
आओ मेरे साथ चलो तुम सीमा से शमशान तक
सोये हैं कुछ शेर यहां पर धीरे धीरे आना
आंसू दो टपका देता पर ताली नहीं बजाना

शहीद की शवयात्रा देख कर मुझमें भाव जगे

चाहता हूं तुझको तेरे नाम से पुकार लूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

बारंबार पिटा सीमा पर भूल गया औकात को
चोरी चोरी लगा नोचने भारत के जज्‍बात को
धूल धूसरित कर डाला इस चोरों जैसी चाल को
मार पीट कर दूर भगाया उग्र हुए श्रंगाल को
इन गीदड़ों को रौंद कर जिस जगह पे तू मरा
मैं चूम लूं दुलार से पूजनीय वो धरा
दीप यादों के जलाऊं काम सारे छोड़कर
चाहता हूं भावनाएं तेरे लिए वार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

सद्भावाना की ओट में शत्रु ने छद्म किया
तूने अपने प्राण दे ध्‍वस्‍त वो कदम किया
नाम के शरीफ थे जब फोज थी बदमाश उनकी
इसलिए तो सड़ गयी कारगिल में लाश उनकी
सूरत भी न देखी उनकी उनके ही परिवार ने
कफन दिया न दफन किया पाक की सरकार ने
लौट आया शान से तू तिरंगा ओढ़कर
चाहता हूं प्‍यार से तेरी राह को बुहार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद की मां को प्रणाम

कर गयी पैदा तुझे उस कोख का एहसान है
सैनिकों के रक्‍त से आबाद हिन्‍दुस्‍तान है
तिलक किया मस्‍तक चूमा बोली ये ले कफन तुम्‍हारा
मैं मां हूं पर बाद में, पहले बेटा वतन तुम्‍हारा
धन्‍य है मैया तुम्‍हारी भेंट में बलिदान में
झुक गया है देश उसके दूध के सम्‍मान में
दे दिया है लाल जिसने पुत्र मोह छोड़कर
चाहता हूं आंसुओं से पांव वो पखार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद की पत्‍नी को सम्‍मान

पाक की नापाक जिद में जंग खूनी हो गयी
न जाने कितनी नारियों की मांग सूनी हो गयी
हो गयी खामोश उसकी लापता मुस्‍कान है
जानती है उम्र भर जीवन तेरी सुनसान है
गर्व से फिर भी कहा है देख कर ताबूत तेरा
देश की रक्षा करेगा देखना अब पूत मेरा
कर लिए हैं हाथ सूने चूडि़यों को तोड़कर
वंदना के योग्‍य देवी को सदा सत्‍कार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद के पिता को प्रणाम

लाडले का शव उठा बूढ़ा चला शमशान को
चार क्‍या सौ सौ लगेंगे चांद उसकी शान को
कांपते हाथों ने हिम्‍मत से सजाई जब चिता
चक्षुओं से अक्ष बोले धन्‍य हैं ऐसे पिता
देश पर बेटा निछावर शव समर्पित आग को
हम नमन करते हैं उनके, देश से अनुराग को
स्‍वर्ग में पहले गया बेटा पिता को छोड़कर
इस पिता के चरण छू आशीष लूं और प्‍यार लूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद के बालकों को प्‍यार दुलार

कौन दिलासा देगा नन्‍हीं बेटी नन्‍हें बेटे को
भोले बालक देख रहे हैं मौन चिता पर लेटे को
क्‍या देखें और क्‍या न देखें बालक खोये खोये से
उठते नहीं जगाने से ये पापा सोये सोये से
हैं अनभिज्ञ विकट संकट से आपसे में बतियाते हैं
अपने मन के भावों को प्रकट नहीं कर पाते हैं
उड़कर जाऊं दुश्‍मन के घर उसकी बांह मरोड़कर
बिना नमक के कच्‍चा खाकर लंबी एक डकार लूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

शहीद की बहन को स्‍नेह

सावन के अंतिम दिवस ये वेदना सहनी पड़ेगी
जो कसक है आज की हर साल ही सहनी पडे़गी
ढूंढ़ती तेरी कलाई को धधकती आग में
न रहा अब प्‍यार भैया का बहन के भाग में
किस तरह बांधे ये राखी तेरी सुलगती राख में
न बचा आंसू कोई उस लाडली की आंख में
ज्‍यों निकल जाए कोई नाराज हो घर छोड़कर
चाहता हूं भाई बन मैं उसे पुचकार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं

पाक को चेतावनी

विध्‍वंश के बातें न कर बेवजह पिट जायेगा
तू मिटेगा साथ तेरा वंश भी मिट जायेगा
कुछ सीख ले इंसानियत तेरा विश्‍व में सम्‍मान हो
हम नहीं चाहते तुम्‍हारा नाम कब्रिस्‍तान हो
चेतावनी है हमारी छोड़ आदत आसुरी
न रहेगा बांस फिर और न बजेगी बांसुरी
उड़ चली अग्‍नि अगर आवास आपना छोड़कर
चाहता हूं पाक को मैं जरा ललकार दूं
ए शहीद आ तेरी मैं आरती उतार लूं
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शनिवार, 24 जुलाई 2010

बधाई बधाई बधाई : हिन्‍दी ब्‍लॉगरों का डीएलए में चिंतन


एक बधाई दिविक रमेश जी को
दूसरी बधाई अविनाश वाचस्‍पति जी को
तीसरी बधाई
यह आप बतलायें
इंतजार रहेगा
पहेली ही सहेली है
सहेली ही पहेली है

डीएलए दिनांक 24 जुलाई 2010 में प्रकाशित स्‍तंभ ब्‍लॉग चिंतन से साभार

शुक्रवार, 25 जून 2010

कुछ भूखे ऐसे भी....

भूख का नर्तन



रेल की पटरियां
और उन पड़ी दो लाशें
कैसे उठाएं किसे तलाशें
एक आदमी और एक जानवर
दोनों कट गये
इत्‍तेफाकन,
एक दूसरे से सट गये
लोग उचक-उचक देखते
आते और चले जाते
समय का परिवर्तन हुआ
भूख का नर्तन हुआ
अब भीड़ बढ़ रही थी
लाश उठाने को,
लड़ रही थी
भीड़ आदमियों की थी
लड़ती रही
लाश आदमी की थी
सड़ती रही

भीड़ ने आदमी की लाश का
क्या करना था
उससे किसका पेट भरना था

बुधवार, 16 जून 2010

लंगोटी .... पर नजर

कहावत का पोस्टमार्टम


मेरी समझ काफी समझदार है लेकिन एक बात समझ से बाहर है कि आदमी भागते भूत की लंगोटी ही सही... क्यों कहता है। पहली बात तो ये विवादास्पद है कि भूत होता भी है या नहीं। वैसे लोकमान्यताओं के अनुसार भूत वह भटकती आत्मा होती है जो लोग अपने जीवन की मझधार में यमदूतों के हत्थे चढ़ जाते हैं और यमराज उन्हें स्वीकारता नहीं। न तो उन्हें स्वर्ग में एडमीशन मिल पाता है और न ही नर्क में। इधर परिवार के सदस्यों को इस अजीबो गरीब समस्या पर विचार करने की फुरसत नहीं होती क्योंकि वे लोग उसके शरीर को आग को समर्पित कर बीमा कंपनी के चक्कर लगा रहे होते हैं। कहां मिलती है फुरसत।
विचारणीय विषय है जिनके पास अपना शरीर ही नहीं होता तो वह भागेगा कैसे। मान लो बिना टांगों के भागा होगा जैसा कि हमारे देश में अफवाहें भागती हैं। कुछ समय पहले एक काला बंदर गाजियाबाद में भाग रहा था। इससे पहले पूरा भारत ही बौराया था गणेश जी को दुग्धपान कराकर। भला जो मोदक प्रिय हो उसे दूध चाय से क्या लेना। लोगों की नादानी से नाली के कीड़े भी धन्य हो गये दूध में नहा धोकर।
अफवाहों की तरह माना कि भूत भी भाग रहा होगा। लेकिन उसकी टांग नहीं तो उसके पास लंगोटी कहां से होगी। होगी भी तो किस काम की। चलो माना कि होगी, तो एक सवाल उठता है - कि आदमी भूत की लंगोटी खींचने से इतना संतुष्‍ट क्यों। मेरी समझ से तो दो ही कारण हो सकते हैं, खुद को ढकना चाहता है या उसको नंगा करना चाहता है और दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो.. देखो.. ये भी नंगा हो गया। आदमी भी क्या गफलत में रहता है। जिसका तन ही नहीं उसको भी नंगा करने पर उतारू है।
एक बात कहूं- लंगोटी खींचना कोई अचंभे वाली बात नहीं है। अचंभे वाली बात तो ये है कि जब भूत का तन नहीं होता तो भी आदमी न जाने क्या देखना चाहता है। क्या तन वालों को नंगा देखकर मन नहीं भरा। वैसे आदमी के लिए किसी की भी कहीं भी और कभी भी लंगोटी खींचना कोई बड़ी बात नहीं है। खींचता जो रहता है एक दूसरे की। फिर भूत क्या चीज है। गनीमत है भूत ही इस घटना का शिकार हुआ है, भूतनी बच गयी है।
वरना आदमी का भी क्या भरोसा। वैसे मैंने काफी मनन किया है इस कहावत के जन्मदाता के विषय में। न जाने क्या सोचकर उसने इस कहावत की रचना कर डाली। वैसे ये शोध का विषय तो है। लंगोटी की जगह पाजामा भी तो खींचा जा सकता था। बनियान खींचा जा सकता था, कमीज खींची जा सकती थी। लंगोटी पर ही क्यों नजरें टिकाईं आदमी ने।
हां, जिस चीज की ज्यादा जरूरत होती है उसी पर ज्यादा तवज्जो दी जाती है पर लंगोटी न हो तो भी पाजामे से काम चलाया जा सकता था। चाहे जो भी हो बात जम नहीं रही, कहावत भी नहीं। एक कहावत और है इस हमाम में सभी नंगे, आदमी शायद इसी कहावत को सही साबित करने पर आमादा हो।
आप भी सोचो, मैं भी सोच रहा हूं। हो सकता है आदमी ईर्ष्‍या के वशीभूत हो ऐसी हरकत करना चाहता हो। क्योंकि ईर्ष्‍या करना भी आदमी के शगलों में एक खास शगल है।
जिसकी होती नहीं काया वो भी नहीं बच पाया