मीटिंग ए माइल स्टोन के एक दृश्य से उपजी प्रतिक्रियात्मक कविता
गंगा के तट पर
पत्थर के पट पर
रजक धोता है
हमारे कपड़ों का मैल और चीकट
साथ में धोना चाहता है
अपनी विपन्नता का संकट
गंगा के किनारे
जी रहा है इसी आशा के सहारे
पानी में होकर भी
पानी से नहीं,
भीगा है पसीने से
तरबतर
तर जायेगा
भागीरथ के पुरखों की तरह
पतित पावनी गंगा है न
ये भी जीवन की शहनाई है न
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