मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012
मोक्ष क्या है....कैसे मिलेगा... पढि़ये व्यंग्य
शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
आज हरिभूमि में प्रकाशित आप भी पढ़े.....
अंत में मैं तो यही कहू्ंगा कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता’ को मानने वाले देश के तहजीबयाफ्ता शहर लखनऊ में ऐसी अशोभनीय घटना हो जाए तो महिलाओं के लिए ही नहीं, देश और शहर दोनों के लिए भी अशोभनीय है। पर कौन मानता है इन सब प्रतिमानों को। हमारे बुजुर्ग कहा करते थे कि कम बोलना और कम खाना कभी नुकसान नहीं देता। बात सही भी है। आदमी जब तक बोलता नहीं, उसके शब्द उसके काबू में रहते हैं और जब बोल देता है तो वह अपने ही शब्दों के काबू में आ चुका होता है। अब ये बात कौन समझाये इनको...?
शनिवार, 29 सितंबर 2012
उस थाली में क्या था....?
इस थाली में, अखबार में छपी खबर के अनुसार कुल छत्तीस भोग थे। देश के बड़े लोग छत्तीस भोग नहीं खायेंगे तो कौन खायेगा। अखबार वाले भी अजीब होते हैं.... अभी दो दिन पहले ही सरकारी कर्मचारियों को सात प्रतिशत मंहगाई भत्ता मिलने की घोषणा हुई थी। घोषणा होने की खबर के साथ देश पर पड़ने वाले बोझ की गणना करना और उसे प्रकाशित करना नहीं भूले। छपा था.... सात हजार चार सौ आठ करोड़ का बोझ देश पर पड़ गया। मंहगाई भत्ता बढ़ने से बोझ और थाली की कीमत से....? लगता है कि अखबार नवीसों के पास अभी इतने उन्नत कैलकुलेटर नहीं हैं कि इन तथाकथित कीमती लोगों के खर्चों की गणना कर पाएं... शायद....डिजिट कम पड़ जाएं....।
मंगलवार, 11 सितंबर 2012
नोंक-झोंक.... हाथी और ऊंट में....
हाथी
हाथी बोला ऊंट से तुम क्या लगते हो ठूंठ से
कमर में कूबड़ कैसा है गला गली के जैसा है
दुबली पतली काया है कब से कुछ नहीं खाया है
हर कोने से सूखे हो लगता बिलकुल भूखे हो
कहां के हो क्या हाल है लगता पड़ा अकाल है
ऊंट
ऐ भोंदूमल गोल मटोल मोटे तू ज्यादा मत बोल
सबसे ज्यादा खाया है तू खा-खा कर मस्ताया है
फसलें चाहे अच्छी हों गन्ना हो या मक्की हो
तेरे जैसे हों दो चार हो जायेगा बंटाढार
जैसा अपना इण्डिया गेट देख देखकर तेरा पेट
समझ गये हम सारा हाल क्यों पड़ता है रोज अकाल
सब कुछ तू खा जायेगा तो ऊंट कहां से खायेगा
शनिवार, 12 मई 2012
जरा कल्पना कीजिए ..........
रविवार, 5 जून 2011
रामदेव बाबा और व्यंग्य लेख
कपाल-भाती या कमाल-भाती
एक हैं अण्णा हजारे, भ्रष्टाचार के तालाब में खूब पत्थर मारे। उनसे उठी लहरें अभी शांत भी नहीं हो पायीं थी कि बाबा राम देव आ गये। आ गये और इस कदर छा गये कि वर्तमान सरकार के चार मंत्री आनन फानन में अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंच गये। वहां क्या हुआ, पता नहीं पर एक बात जो हमने जानी, वो ये कि इन्होंने जीवन भर योग मुद्राएं सिखायीं और जनता ने सीखीं। देश के आलाओं ने जरा उलट सीख लीं...। इन्होंने ‘ योग की मुद्राएं ’ की जगह ‘ मुद्राओं का योग ‘ सीख डाला। अब कोई इनसे पूछे कि यह मामला थोड़ा उलट ही तो हुआ है। इसमें इतनी हाय तौबा की क्या जरूरत है। आपने ही सिखाया है तोंद में हवा भरो और निकालो। कुछ ने भरी और निकाली। कुछ ने सिर्फ भरी और निकाली ही नहीं। ये उनकी तौंद का माद्दा है। अब अन्ना हजारे चाहते हैं कि जिस पंप से तौंद फुलाई है उसी में पंचर हो जाए...और आप चाहते हैं कि तौंद ही पंचर कर दी जाए। दोनों पहले से सलाह मशविरा कर लेते तो अच्छा रहता न । आलाओं ने बड़े जतन से पाला है...आसानी से कैसे पंचर कर दें।
आपने अपने खिलाफ निर्णय लिया है कभी...? कहावत आ बैल मुझे मार के बजाय लोग तो नयी कहावत बना चुके हैं कि जा बैल उसे मार। लोग अपने पैर पर कभी कुल्हाड़ी नहीं मारते हैं और आप कह रहे हैं कि आलाओं आओ और कुल्हाड़ी पर पैर मारो... कैसे संभव है...? कौन चाहेगा लहूलुहान होना । मरीज खुद इंजेक्शन नहीं लगा पाता और जब लगावाता है तो मारे डर के मुंह फेर लेता है। फिर आप कैसे उम्मीद करेंगे की मरीज अपने फोड़े में चीरा भी खुद लगा ले। ये योग से तो होता नहीं है और इस चीर-फाड़ को करने के लिए मरीज को बेहोश करना पड़ेगा, या फिर उतने अंग का पीर-हरण करना या सुन्न करना लाजमी है। तभी मुद्राओं के योग का चीर-हरण हो सकेगा। वैसे सरकार की हालत कुछ ऐसी हो गयी है, जैसे पित्रत्व की जांच में फंसे तिवारी जी की हो रही है, कि जांच के लिए खून दें या न दें। बड़ा कष्टकारक है। कोई इनके दर्द को समझेगा तब न। किसी की पीड़ा कोई क्यों समझे....।
यह महाभारत कालीन शब्द चीर-हरण पहले दुष्कृत्य माना जाता था। यह एक महासंग्राम का कारण बन गया था। जहां उसने कौरवों को पराजय का स्वाद चखवाया, वहीं पाण्डवों को उनका राज सिंहासन दिलवाया। यहां भी यही सब कुछ हो सकता है जो महाभारत काल में हुआ था, पर ये चीर-हरण हो तो सही...। अब ये चीर-हरण द्रोपदी का न होकर भारतीय मुद्रा का होना चाहिए। किस-किस के पास कितनी ढकी-दबी रखी है। भेद खुलना ही चाहिए। और मजे की बात है कि इस चीर-हरण को दुष्कृत्य नहीं, सुकृत्य कहा जायेगा। मैं सपने देख रहा हूं कि ऐसा सुकृत्य हो, या मेरा सपना, सपना ही रह जायेगा। काश कपाल-भाती के स्थान पर कोई नयी योगमुद्रा का विकास हो जाए जैसे कमाल-भाती।
पी के शर्मा
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सोमवार, 30 मई 2011
मोबाइल के सीने में भी दर्द है। हां..............
मोबाइल का दर्द
बहुत लंबा हो गया जब इंतजार
आ गया मैं तार पर होकर सवार
खूब इज्जत थी मेरी भी शान थी
मेरी ट्रिन-ट्रिन भी सुरीली तान थी
था बदन बेकार सा काला कलूटा
दीखता था मैं तुम्हें अच्छा अनूठा
मैं पधारा जब तुम्हारे द्वार पर
हो गया लट्टू तुम्हारे प्यार पर
मान में चौकी किसी ने खाट दी
हर पड़ौसी ने मिठाई बांट दी
तुम से ज्यादा थे पड़ौसी साथ मेरे
ले लिए हों जैसे मुझसे सात फेरे
आ गया हूं, मैं नये अवतार में
अब नहीं जुड़ता किसी भी तार में
रह रहा हूं जेब में या हाथ में
अब मजा आता है यूं हर बात में
साथ देता हूं तुम्हारा हर कदम
तुम नहीं हो मेरे सच्चे हमकदम
खोपड़ी के बाल अपने नोच लो
एक शिकवा है हमें अब सोच लो
खूब उंगली पर नचाया था जिसे
अब अंगूठा क्यों दिखाते हो उसे
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