शनिवार, 29 सितंबर 2012

उस थाली में क्‍या था....?


कीमती लोग कीमती भोग




एक थाली पर कितना खर्चा है..आजकल इसकी बड़ी चर्चा है। पता नहीं क्‍यों ताकते हैं लोग दूसरे की थाली में....क्‍या क्‍या भरा थाली में रखी प्‍याली में। अच्‍छी आदत तो नहीं है। मुझे भी पसंद नहीं है दूसरे की थाली में घी को देखना। वैसे तो निगोड़े डाक्‍टर ने अपनी ही थाली में घी देखने को मना कर दिया है। घी और मक्‍खन सब बंद है। मक्‍खन लगाना तो मेरी चर्या में ही नहीं था। वैसे हमें ये बताया भी गया था कि मक्‍खन लगाने लगवाने से जिंदगी आसान हो जाती है..लेकिन स्‍वाभिमान की कीमत पर।

दूसरों की थाली में झांकने की बात हो रही थी... थाली में खीर थी या खीरा, हल्‍दी थी या जीरा। इससे क्‍या होता है.. सबके घर में हैं। नहीं है तो बस वह रकम, जो थाली के साथ जुड़ी है। सात हजार सात सौ इक्‍कीस रूपये। हम दाल रोटी खाने वाले इतनी बड़ी रकम सुनकर खाना खाने के बजाए हावका खा जाते हैं। इस क्षेत्र में हमारा नजरिया संकीर्ण नहीं होना चाहिए था। बड़ी पार्टियों के गठबंधन की तीसरी सालगिरह थी। कीमत बड़ी हो गयी तो क्‍या हुआ...?  पहले एक रूपये में सोलह आने हुआ करते थे और एक आने की एक थाली हुआ करती थी। अब देखो न, इस पुरानी गरीबी को देखते हुए गरीबों की थाली भी पूरे सोलह रूपये की हो गयी है। उसकी भी तो कीमत बढ़ी ही है, इनकी थाली की बढ़ गयी तो इतनी चिल्‍ल-पों क्‍यों..?  जितने कीमती लोग.. उतना कीमती भोग। देश में तीन साल से लगातार मिलकर, खाने का उत्‍सव था। वैसे भी कोयले खाने के बाद कुछ स्‍वाद भी तो बदलना जरूरी था।

ये लोग सच में कीमती हैं। जब चाहे सरकार गिरा दें। सरकार भी अब क्रिकेट के विकिट की तरह हो गयी है। जो चाहे गुगली डाले और चुनाव करा ले। फिर बढ़ेगा देश पर बोझ। दावत का खर्च उस बोझ के मुकाबले नगण्‍य है। दावत पानी होता रहना चाहिए। इसके और भी बहुत से फायदे हैं.... दूसरे के पेट की पावर का भी पता चल जाता है। कौन, कितना हजम कर जायेगा..?  अब तक कितना खा चुका है, और कितना खायेगा..। यहीं खायेगा या घर भी ले जायेगा...। अकेला ही आया है या पूरे घर-परिवार-रिश्‍तेदार को भी साथ लाया है, आदि आदि। भले ही हम जैसों को, गैस का सिलिंडर, एक भी आदमी को दावत देने में आनाकानी करने को कह रहा हो...। उनके लिए तो सिलिंडरों का भी टोटा नहीं है।  

       इस थाली में, अखबार में छपी खबर के अनुसार कुल छत्‍तीस भोग थे। देश के बड़े लोग छत्‍तीस भोग नहीं खायेंगे तो कौन खायेगा। अखबार वाले भी अजीब होते हैं.... अभी दो दिन पहले ही सरकारी कर्मचारियों को सात प्रतिशत मंहगाई भत्‍ता मिलने की घोषणा हुई थी। घोषणा होने की खबर के साथ देश पर पड़ने वाले बोझ की गणना करना और उसे प्रकाशित करना नहीं भूले। छपा था.... सात हजार चार सौ आठ करोड़ का बोझ देश पर पड़ गया। मंहगाई भत्‍ता बढ़ने से बोझ और थाली की कीमत से....
लगता है कि अखबार नवीसों के पास अभी इतने उन्‍नत कैलकुलेटर नहीं हैं कि इन तथाकथित कीमती लोगों के खर्चों की गणना कर पाएं... शायद....डिजिट कम पड़ जाएं....।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

नोंक-झोंक.... हाथी और ऊंट में....


हाथी


हाथी बोला ऊंट से तुम क्या लगते हो ठूंठ से
कमर में कूबड़ कैसा है गला गली के जैसा है
दुबली पतली काया है कब से कुछ नहीं खाया है
हर कोने से सूखे हो लगता बिलकुल भूखे हो
कहां के हो क्या हाल है लगता पड़ा अकाल है

ऊंट


ऐ भोंदूमल गोल मटोल मोटे तू ज्यादा मत बोल
सबसे ज्यादा खाया है तू खा-खा कर मस्ताया है
फसलें चाहे अच्छी हों गन्ना हो या मक्की हो
तेरे जैसे हों दो चार हो जायेगा बंटाढार
जैसा अपना इण्डिया गेट देख देखकर तेरा पेट
समझ गये हम सारा हाल क्यों पड़ता है रोज अकाल

सब कुछ तू खा जायेगा तो ऊंट कहां से खायेगा

शनिवार, 12 मई 2012

जरा कल्‍पना कीजिए ..........



आबादी घटायेंगे तो रिश्‍ते भी घट जायेंगे 




देश के भविष्य का वास्ता देकर एक नारा दिया गया था ...... दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे । इस पर देश वासियों ने अमल किया भी, नहीं भी । कारण कुछ भी रहे हों, तीन बच्चे... अच्छे होते तो थे.... पर घर में, सफर में नहीं । अब नारा देने वालों ने मुसीबत कम करने में मदद की और दूसरा सीधा सपाट सा नारा ठोंक दिया... हम दो, हमारे दो । जी हां,  हम दो,  हमारे दो । इसके बाद, चैन से सो...हरकत बंद,  तीसरे पर प्रतिबंध । यह नारा कुछ ठीक लगा । सफर में रंग रहे । दो बच्चों का संग रहे । मियां बीवी के गिले शिकवे समाप्त । परिवार की इस मिली-जुली उपलब्धि को फिफ्टी-फिफ्टी बांट कर चलो मजे से,  सफर हो या सैर सपाटा । परिवार,  न बढ़ा,  न घटा । जनसंख्या भी जहां की तहां । मगर मेरे देश के लल्लुओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी और बड़े परिवार को संभालने में चारा तक खा गये । नतीजा..... नारा,  न रहा ।
लेकिन हमारी तरफ से नारा देने वालों को थैंक्यू । क्योंकि जनसंख्या पर इसी नारे से पूर्ण विराम लग सकता था लेकिन उनको तो देश की भलाई,  जनसंख्या रोकने के बजाय,  घटाने में नजर आ रही थी । सो भई उन्होंने जनसंख्या घटाने के लिए एक नया नारा जोड़ दिया । नारा देने की आदत जो ठहरी । नारा मिला ---
हम दोनों एक,  हमारा एक ।
नारा बड़ा असरदार लगा । असर दिखायेगा या नहीं, ये अलग बात है । अगर असर दिखाया तो जनसंख्या का ग्राफ शेयर मार्किट की तरह ओंधे मुंह गिरेगा । लेकिन इस बाउंसरी नारे को फैंकने से किन-किन रिश्तों की विकिट परमानैंट गिरेंगीं  ?  नारा देने वालों को हो न हो पर हमें इसका एडवांस में अफसोस है । क्योंकि .... इस नारे के इम्पलीमैंट होने से ... जीवन नीरस हो जायेगा । रसरंग नहीं होगा । ‘भास्‍कर वाला होगा’ । त्यौहार बेमजा होंगे । चलो ये भी सही, पर कुछ तो होंगे ही नहीं । क्योंकि कुछ त्यौहार रिश्तों की बैशाखियों पर खड़े हैं,  बैशाखी को छोड़कर । रिश्ते ढह जाएंगे, त्यौहार इतिहास के पन्नों पर रह जाएंगे । आप भी कल्पना करके देखिये ऐसे नवयुग की ।
शादी में दूल्हे के जूतों का अपहरण करने का रिवाज होता है । और इस क्रिया को सरअंजाम देती हैं साली जी । अब जब साली ही नहीं होगी तो क्या इस हरकत को सास करेगी ? और अगर कर भी देगी तो .... क्या और कौन सा लुत्फ आयेगा ?  दूल्हा मन मसोस कर रह जायेगा कि कोई जीजा जी कहने वाली ही नहीं है । अगर होती तो इस गाने का रिकार्ड बज रहा होता --
दुल्हन के देवर,  तुम दिखलाओ न यूं तेवर । पैसे दे दो, जूते ले लो ।
ये बात यहीं तक रहती तो भी गनीमत थी,  लेकिन... जीजा जी कहने....वाली तो दूर, वाला भी नहीं होगा । मतलब साफ कि साला नहीं । इट मींस बच्‍चे का मामा नहीं । शादियों में भात का रिवाज खत्म । हुआ न विवाह की एक रस्म का अंत ।
मामा-मामी नहीं तो भांजा भी नहीं । मामा-भांजे दोनों नहीं तो महाभारत नहीं । बी.आर.चैपड़ा खुजलाते थोबड़ा । मामा कंस और शकुनि,  न होंगे न मरेंगे । और आगे बढ़ो नुकसानदेह मसला है । भाई नहीं, तो रावण मरेगा ही नहीं । शायद राम को ही सीता वियोग में ....?  बहन नहीं,  भाई नहीं । रक्षाबंधन का बंधन समाप्त । भइया दूज का अवसान निश्चित । राखी बनाने वालों का धंधा चोपट । चलो एक फायदा तो होगा ही ननद भौजाई न होंगी न लड़ेंगी ।
चलिए आगे,  एक और सजा । भाभी नहीं तो होली बेमजा । कहते हैं --
सावन मीठा नहीं होता जब तक घेवर नहीं होता
बहू,  भाभी नहीं होती जब तक देवर नहीं होता
कौन गुदगुदायेगा देवर को ? कौन चहकाएगा भाभी को ? दीदी के दिवाने देवर, कुडि़यों को दाना नहीं डाल पायेंगे और न ही कोई देवर कह पायेगा .... भाभी तेरी बहना को माना, हाय रा........म, कुडि़यों का है जमाना ....। गांवों में प्रचलित एक लोकोक्ति आपने जरूर सुनी होगी ...
गन्ने से गंडेरी मीठी  सबसे मीठा राळा
भाई से भतीजा प्यारा सबसे प्यारा साळा
ऐसी लोकोक्तियां आप कभी व्यवहार में नहीं ला पाएंगे । लोकगीतों का भी सत्यानाश होगा....
सरोता कहां भूल आये प्यारे ननदोइया.....हम खो जाते है जिस-जिस रंगीन लोकगीत में,  सब खो जायेंगे अतीत में । एक हरियाणवी गीत -
जिज्जा तू काळा मैं गोरी घणी ।
न जीजा हों,  न सालियां हों....न गीतकार इस तरह के गीत कल्पना में ला पाएं । ओवर ऑल रिश्तों व त्यौहारों पर परमाणु बम का सा हमला होगा । मगर मित्रो ... जहां नुकसान होता है वहां कुछ लाभ भी होता है ।
लाभ सुनो .... दहेज प्रथा बिना प्रयास के समाप्त । दोनों परिवारों का सामान व पैसा एक ही घर और एक ही तिजोरी में । शादियां.....सस्ती और आसान । जनसंख्या का ग्राफ घटना शुरू । गरीबी समाप्त होने की तरफ और देश तरक्की की राह पर । दो-दो सास-ससुर के जत्थे, एक ही मियां बीवी के मत्थे । वरना बूढ़े-बुढि़या कहां जाएंगे ?  बहू, जलाई नहीं जा सकेगी । अगर जली भी, तो... दामाद का भी नंबर लगेगा । ईंट का जवाब पत्थर से मिलेगा ।
समस्याएं स्वतः हल होंगी । जिन्दगी सफल होगी । जमीन-जायदाद के पारिवारिक झगड़े नहीं होंगे । राजनीति में भाई-भतीजावाद नहीं होगा, पुत्रवाद या पुत्रीवाद को छोड़कर। क्या-क्या होगा, और क्या-क्या नहीं होगा ... कुछ आप भी सोच लेना .... मैंने क्या... ठेका ले रखा है सब कुछ सोचने, बताने का ? पर यदि ऐसी क्रांतिकारी शुरूआत वास्तव में होती है ... तो होने दीजिए ... इसी में भलाई है ।  मैं, ऐसे नवयुग का स्वागत करने के लिए पांचवे युग तक जीवित रहना चाहूंगा, जब हम ... अरबों से करोड़ों की तरफ लौट चलेंगे । ये मेरा इरादा है,  और आपका ? क्या खयाल है ? दादा जी बनना पसंद करोगे या नाना जी ?
-------------------

पी के शर्मा



रविवार, 5 जून 2011

रामदेव बाबा और व्‍यंग्‍य लेख

कपाल-भाती या कमाल-भाती

एक हैं अण्णा हजारे, भ्रष्‍टाचार के तालाब में खूब पत्‍थर मारे। उनसे उठी लहरें अभी शांत भी नहीं हो पायीं थी कि बाबा राम देव आ गये। आ गये और इस कदर छा गये कि वर्तमान सरकार के चार मंत्री आनन फानन में अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंच गये। वहां क्‍या हुआ, पता नहीं पर एक बात जो हमने जानी, वो ये कि इन्‍होंने जीवन भर योग मुद्राएं सिखायीं और जनता ने सीखीं। देश के आलाओं ने जरा उलट सीख लीं...। इन्‍होंने ‘ योग की मुद्राएं ’ की जगह ‘ मुद्राओं का योग ‘ सीख डाला। अब कोई इनसे पूछे कि यह मामला थोड़ा उलट ही तो हुआ है। इसमें इतनी हाय तौबा की क्‍या जरूरत है। आपने ही सिखाया है तोंद में हवा भरो और निकालो। कुछ ने भरी और निकाली। कुछ ने सिर्फ भरी और निकाली ही नहीं। ये उनकी तौंद का माद्दा है। अब अन्‍ना हजारे चाहते हैं कि जिस पंप से तौंद फुलाई है उसी में पंचर हो जाए...और आप चाहते हैं कि तौंद ही पंचर कर दी जाए। दोनों पहले से सलाह मशविरा कर लेते तो अच्‍छा रहता न । आलाओं ने बड़े जतन से पाला है...आसानी से कैसे पंचर कर दें।

आपने अपने खिलाफ निर्णय लिया है कभी...? कहावत आ बैल मुझे मार के बजाय लोग तो नयी कहावत बना चुके हैं कि जा बैल उसे मार। लोग अपने पैर पर कभी कुल्‍हाड़ी नहीं मारते हैं और आप कह रहे हैं कि आलाओं आओ और कुल्‍हाड़ी पर पैर मारो... कैसे संभव है...? कौन चाहेगा लहूलुहान होना । मरीज खुद इंजेक्‍शन नहीं लगा पाता और जब लगावाता है तो मारे डर के मुंह फेर लेता है। फिर आप कैसे उम्‍मीद करेंगे की मरीज अपने फोड़े में चीरा भी खुद लगा ले। ये योग से तो होता नहीं है और इस चीर-फाड़ को करने के लिए मरीज को बेहोश करना पड़ेगा, या फिर उतने अंग का पीर-हरण करना या सुन्‍न करना लाजमी है। तभी मुद्राओं के योग का चीर-हरण हो सकेगा। वैसे सरकार की हालत कुछ ऐसी हो गयी है, जैसे पित्रत्‍व की जांच में फंसे तिवारी जी की हो रही है, कि जांच के लिए खून दें या न दें। बड़ा कष्‍टकारक है। कोई इनके दर्द को समझेगा तब न। किसी की पीड़ा कोई क्‍यों समझे....।

यह महाभारत कालीन शब्‍द चीर-हरण पहले दुष्‍कृत्‍य माना जाता था। यह एक महासंग्राम का कारण बन गया था। जहां उसने कौरवों को पराजय का स्‍वाद चखवाया, वहीं पाण्‍डवों को उनका राज सिंहासन दिलवाया। यहां भी यही सब कुछ हो सकता है जो महाभारत काल में हुआ था, पर ये चीर-हरण हो तो सही...। अब ये चीर-हरण द्रोपदी का न होकर भारतीय मुद्रा का होना चाहिए। किस-किस के पास कितनी ढकी-दबी रखी है। भेद खुलना ही चाहिए। और मजे की बात है कि इस चीर-हरण को दुष्‍कृत्‍य नहीं, सुकृत्‍य कहा जायेगा। मैं सपने देख रहा हूं कि ऐसा सुकृत्‍य हो, या मेरा सपना, सपना ही रह जायेगा। काश कपाल-भाती के स्‍थान पर कोई नयी योगमुद्रा का विकास हो जाए जैसे कमाल-भाती।

पी के शर्मा

1/12 रेलवे कालोनी सेवानगर नई दिल्‍ली 110003

9990005904 9717631876

सोमवार, 30 मई 2011

मोबाइल के सीने में भी दर्द है। हां..............






मोबाइल का दर्द



बहुत लंबा हो गया जब इंतजार

आ गया मैं तार पर होकर सवार

खूब इज्जत थी मेरी भी शान थी

मेरी ट्रिन-ट्रिन भी सुरीली तान थी

था बदन बेकार सा काला कलूटा

दीखता था मैं तुम्हें अच्छा अनूठा


मैं पधारा जब तुम्हारे द्वार पर

हो गया लट्टू तुम्हारे प्यार पर

मान में चौकी किसी ने खाट दी

हर पड़ौसी ने मिठाई बांट दी


तुम से ज्यादा थे पड़ौसी साथ मेरे

ले लिए हों जैसे मुझसे सात फेरे

आ गया हूं, मैं नये अवतार में

अब नहीं जुड़ता किसी भी तार में


रह रहा हूं जेब में या हाथ में

अब मजा आता है यूं हर बात में

साथ देता हूं तुम्हारा हर कदम

तुम नहीं हो मेरे सच्चे हमकदम


खोपड़ी के बाल अपने नोच लो

एक शिकवा है हमें अब सोच लो

खूब उंगली पर नचाया था जिसे

अब अंगूठा क्यों दिखाते हो उसे

--------------

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

होली पर एक राज़ की बात। जानना चाहोगे ?

क्‍यों लगाते हैं गुलाल, होली में

बहुत पुरानी कहानी है; राजा हिरण्‍यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सगाई राजस्‍थान में बाड़मेर राज्‍य के एक अतिसुंदर नौजवान राजकुमार ईलोजी से तय कर दी। राक्षस जैसे सुंदर होने चाहिए वैसे ही थे, ईलोजी। खरबूजे जैसे गाल, आम की फांक जैसी आंखें, भैंसे जैसा शरीर, मटके का सा पेट और बेडौल शरीर का मालिक। राजकुमारी होलिका ईलोजी के इसी रूप पर मोहित हो गयी थी।

ईलोजी भी काली-कलूटी होलिका की सुंदरता का वर्णन सुनकर बेहद प्रभावित हो गया और शादी करने को राजी हो गया था। होलिका तपस्विनी भी थी। उसने तपस्‍या द्वारा अपना प्रभाव इतना बढ़ा लिया था कि उसका भाई हिरण्‍यकशिपु भी उसका बहुत सम्‍मान करता था और बड़ी-बड़ी राजनैतिक उलझनों में उससे सलाह लिया करता था। होलिका को बस एक ही दुख था। उसका रंग बिलकुल काला था। इसके विपरीत ईलोजी बेडौल पर, गोरा था। इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए होलिका ने अग्नि की उपासना की और अग्नि देवता से अग्नि जैसा दहकता और दमकता हुआ रूप मांगा। अग्नि देवता ने प्रसन्‍न होकर होलिका को वरदान देते हुए कहा- ‘ तुम जब चाहोगी, अग्नि-स्‍नान कर सकोगी और अग्नि-स्‍नान के बाद एक दिन और एक रात के लिए तुम्‍हारा रूप अग्नि के समान जगमगाता रहेगा’। अब तो होलिका की मौज आ गयी थी। वह नगर के चौक पर चंदन की चिता में बैठकर रोज अग्नि-स्‍नान करने लगी। इससे होलिका का रूप चलती-फिरती बिजली सा चमकने लगा था। ईलोजी अपनी भावी दुल्‍हन की तपस्‍या और रंग-रूप से बेहद प्रभाविता हो चुके थे।

वसंत ऋतु में होलिका ईलोजी के विवाह का दिन निश्चित हो गया था। ईलोजी दूल्‍हा बनकर बारात लेकर होलिका से विवाह के लिए चल दिये। बारात आनन्‍द-उत्‍सव मनाती, नाचती-गाती दुल्‍हन के घर पहुंचने वाली थी। इधर ये बारात आने वाली थी, उधर राजा हिरण्‍यकशिपु एक झंझट में फंस गया था। उसका अपना बेटा राजकुमार प्रह्लाद विद्रोही को गया था और उसके महान शत्रु विष्‍णु का भक्‍त बन बैठा था। एक ओर उसकी दुलारी बहन का विवाह और दूसरी ओर उसके अपने बेटे का विद्रोह तथा विष्‍णु के छल-बल से परेशानी का डर। हिरण्‍यकशिपु ने अपनी बहन से सलाह ली। होलिका.... मैं प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास कर चुका, लेकिन वह हर बार बच जाता है। इधर तुम्‍हारे विवाह में दो दिन शेष बचे है और बारात भी आने ही वाली है... मैं सोचता हूं, इस मंगल कार्य में प्रह्लाद के कारण कोई विघ्‍न न उत्‍पन्‍न हो जाए। भाई की परेशानी भांप कर होलिका बोली भइया... अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं आज शाम को जब अग्नि-स्‍नान करूंगी तो प्रह्लाद को भी गोद में लेकर बैठ जाऊंगी। सांप भी मर जायेगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। होलिका भाई की परेशानी को खत्‍म करने के चक्‍कर में ये भी भूल गयी कि अग्नि में प्रवेश से न जलने और सुरक्षित निकलने का वरदान सिर्फ अकेली के लिए था। किसी को साथ लेकर अग्नि-स्‍नान से क्‍या हो सकता है, इसके बारे में सोच ही नहीं रही थी। बस यही भूल उसकी मौत का कारण बन गयी। प्रह्लाद तो सुरक्षित बच गया पर होलिका जलकर राख हो गयी।

होलिका दहन के अगले ही दिन बारात दरवाजे पर आ पहुंची।

ईलोजी ने जब सुना कि होलिका अग्नि-स्‍नान करते समय जल मरी है, तो उसे बड़ा दुख हुआ। वे पागल से होकर होलिका की ठंडी चिता के पास जा पहुंचे और अपने दूल्‍हा वेश पर ही होलिका की राख हो मलने लगे और मिट्टी में लोट-पोट होने लगे। ईलोजी का सारा शरीर, मुंह और कपड़े राख में सन चुके थे। बारातियों ने उस पर पानी डालकर उसे धोने का प्रयास किया लेकिन ईलोजी नहीं माने और राख-मिट्टी में लोट-पोट होते रहे। ईलोजी का यह पागलपन देखकर बारातियों और नगर वासियों ने उसका मजाक बनाना शुरू कर दिया और हंसने लगे। किसी ने उसे रसिया कहा और उसके गले से फूलों की माला निकाल कर जूतो की माला डाल दी। ईलोजी ने अपनी प्रेमिका होलिका की याद में सब कुछ सहा और आजीवन कुंआरे रहने की कसम ले ली। तभी से ईलोजी फागुन के देवता कहलाने लगे। र्इलोजी के विवाह और होलिका दहन की याद में आज भी लोग होलिका दहन करते हैं। अगले दिन ईलोजी के साथ होने वाले हंसी मजाक को भी दोहराया जाता है। हां इतना जरूर है, राख के स्‍थान पर गुलाल का प्रयोग होने लगा है और पानी के स्‍थान पर रंग प्रयोग किया जाने लगा है।

राजस्‍थान में तो कई शहरों, गांव और कस्‍बों में आम चौराहों पर ईलोजी की प्रतिमाएं भी बैठाई जाती हैं और उन्‍हें दूल्‍हे की तरह सजाने और संवारकर रंग-गुलाल से पोतने की प्रथा है। ईलोजी हंसी-मजाज के प्रतीक बन गये हैं। राजस्‍थान में इनके नाम पर ईलोजी मार्किट, ईलोजी सर्किल, ईलोजी मार्ग और ईलोजी चौक से स्‍थानों का नामकरण कर उनको सम्‍मान दिया जाता है। ईलोजी के ही रूप में राजस्‍थानी रसिये दूल्‍हे के वेश में सजकर रंग-गुलाल से सने घोड़ी या गधे पर बैठकर धुलैंहडी के दिन गली चौराहों पर घूमते रहते हैं।

( साभार--- ऐतिहासिक कथाएं )

शनिवार, 12 मार्च 2011

हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन, परिकल्‍पना और नुक्‍कड़डॉटकॉम ने कमाल कर दिया


जी हां , हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के लिए एक सकारात्‍मक कदम हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन के साथ शिखर की ओर बढ़ चला है। विवरण जानने के लिए और अपनी राय व्‍य‍क्‍त करने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए। जानकारी का खजाना खुलेगा। कहा जा रहा है कि यह मील का पत्‍थर बनेगा। पर मेरा मानना है कि यह मीलों लंबी चट्टान बनेगी। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के स्‍वर्णिम युग की शुरूआत हो चुकी है।
आप सब पढ़कर, जानकारी हासिल करके, लौट कर वापिस इसी चौखट पर आइयेगा।