इस थाली में, अखबार में छपी खबर के अनुसार कुल छत्तीस भोग थे। देश के बड़े लोग छत्तीस भोग नहीं खायेंगे तो कौन खायेगा। अखबार वाले भी अजीब होते हैं.... अभी दो दिन पहले ही सरकारी कर्मचारियों को सात प्रतिशत मंहगाई भत्ता मिलने की घोषणा हुई थी। घोषणा होने की खबर के साथ देश पर पड़ने वाले बोझ की गणना करना और उसे प्रकाशित करना नहीं भूले। छपा था.... सात हजार चार सौ आठ करोड़ का बोझ देश पर पड़ गया। मंहगाई भत्ता बढ़ने से बोझ और थाली की कीमत से....? लगता है कि अखबार नवीसों के पास अभी इतने उन्नत कैलकुलेटर नहीं हैं कि इन तथाकथित कीमती लोगों के खर्चों की गणना कर पाएं... शायद....डिजिट कम पड़ जाएं....।
शनिवार, 29 सितंबर 2012
उस थाली में क्या था....?
इस थाली में, अखबार में छपी खबर के अनुसार कुल छत्तीस भोग थे। देश के बड़े लोग छत्तीस भोग नहीं खायेंगे तो कौन खायेगा। अखबार वाले भी अजीब होते हैं.... अभी दो दिन पहले ही सरकारी कर्मचारियों को सात प्रतिशत मंहगाई भत्ता मिलने की घोषणा हुई थी। घोषणा होने की खबर के साथ देश पर पड़ने वाले बोझ की गणना करना और उसे प्रकाशित करना नहीं भूले। छपा था.... सात हजार चार सौ आठ करोड़ का बोझ देश पर पड़ गया। मंहगाई भत्ता बढ़ने से बोझ और थाली की कीमत से....? लगता है कि अखबार नवीसों के पास अभी इतने उन्नत कैलकुलेटर नहीं हैं कि इन तथाकथित कीमती लोगों के खर्चों की गणना कर पाएं... शायद....डिजिट कम पड़ जाएं....।
मंगलवार, 11 सितंबर 2012
नोंक-झोंक.... हाथी और ऊंट में....
हाथी
हाथी बोला ऊंट से तुम क्या लगते हो ठूंठ से
कमर में कूबड़ कैसा है गला गली के जैसा है
दुबली पतली काया है कब से कुछ नहीं खाया है
हर कोने से सूखे हो लगता बिलकुल भूखे हो
कहां के हो क्या हाल है लगता पड़ा अकाल है
ऊंट
ऐ भोंदूमल गोल मटोल मोटे तू ज्यादा मत बोल
सबसे ज्यादा खाया है तू खा-खा कर मस्ताया है
फसलें चाहे अच्छी हों गन्ना हो या मक्की हो
तेरे जैसे हों दो चार हो जायेगा बंटाढार
जैसा अपना इण्डिया गेट देख देखकर तेरा पेट
समझ गये हम सारा हाल क्यों पड़ता है रोज अकाल
सब कुछ तू खा जायेगा तो ऊंट कहां से खायेगा
शनिवार, 12 मई 2012
जरा कल्पना कीजिए ..........
रविवार, 5 जून 2011
रामदेव बाबा और व्यंग्य लेख
कपाल-भाती या कमाल-भाती
एक हैं अण्णा हजारे, भ्रष्टाचार के तालाब में खूब पत्थर मारे। उनसे उठी लहरें अभी शांत भी नहीं हो पायीं थी कि बाबा राम देव आ गये। आ गये और इस कदर छा गये कि वर्तमान सरकार के चार मंत्री आनन फानन में अगवानी करने हवाई अड्डे पहुंच गये। वहां क्या हुआ, पता नहीं पर एक बात जो हमने जानी, वो ये कि इन्होंने जीवन भर योग मुद्राएं सिखायीं और जनता ने सीखीं। देश के आलाओं ने जरा उलट सीख लीं...। इन्होंने ‘ योग की मुद्राएं ’ की जगह ‘ मुद्राओं का योग ‘ सीख डाला। अब कोई इनसे पूछे कि यह मामला थोड़ा उलट ही तो हुआ है। इसमें इतनी हाय तौबा की क्या जरूरत है। आपने ही सिखाया है तोंद में हवा भरो और निकालो। कुछ ने भरी और निकाली। कुछ ने सिर्फ भरी और निकाली ही नहीं। ये उनकी तौंद का माद्दा है। अब अन्ना हजारे चाहते हैं कि जिस पंप से तौंद फुलाई है उसी में पंचर हो जाए...और आप चाहते हैं कि तौंद ही पंचर कर दी जाए। दोनों पहले से सलाह मशविरा कर लेते तो अच्छा रहता न । आलाओं ने बड़े जतन से पाला है...आसानी से कैसे पंचर कर दें।
आपने अपने खिलाफ निर्णय लिया है कभी...? कहावत आ बैल मुझे मार के बजाय लोग तो नयी कहावत बना चुके हैं कि जा बैल उसे मार। लोग अपने पैर पर कभी कुल्हाड़ी नहीं मारते हैं और आप कह रहे हैं कि आलाओं आओ और कुल्हाड़ी पर पैर मारो... कैसे संभव है...? कौन चाहेगा लहूलुहान होना । मरीज खुद इंजेक्शन नहीं लगा पाता और जब लगावाता है तो मारे डर के मुंह फेर लेता है। फिर आप कैसे उम्मीद करेंगे की मरीज अपने फोड़े में चीरा भी खुद लगा ले। ये योग से तो होता नहीं है और इस चीर-फाड़ को करने के लिए मरीज को बेहोश करना पड़ेगा, या फिर उतने अंग का पीर-हरण करना या सुन्न करना लाजमी है। तभी मुद्राओं के योग का चीर-हरण हो सकेगा। वैसे सरकार की हालत कुछ ऐसी हो गयी है, जैसे पित्रत्व की जांच में फंसे तिवारी जी की हो रही है, कि जांच के लिए खून दें या न दें। बड़ा कष्टकारक है। कोई इनके दर्द को समझेगा तब न। किसी की पीड़ा कोई क्यों समझे....।
यह महाभारत कालीन शब्द चीर-हरण पहले दुष्कृत्य माना जाता था। यह एक महासंग्राम का कारण बन गया था। जहां उसने कौरवों को पराजय का स्वाद चखवाया, वहीं पाण्डवों को उनका राज सिंहासन दिलवाया। यहां भी यही सब कुछ हो सकता है जो महाभारत काल में हुआ था, पर ये चीर-हरण हो तो सही...। अब ये चीर-हरण द्रोपदी का न होकर भारतीय मुद्रा का होना चाहिए। किस-किस के पास कितनी ढकी-दबी रखी है। भेद खुलना ही चाहिए। और मजे की बात है कि इस चीर-हरण को दुष्कृत्य नहीं, सुकृत्य कहा जायेगा। मैं सपने देख रहा हूं कि ऐसा सुकृत्य हो, या मेरा सपना, सपना ही रह जायेगा। काश कपाल-भाती के स्थान पर कोई नयी योगमुद्रा का विकास हो जाए जैसे कमाल-भाती।
पी के शर्मा
1/12 रेलवे कालोनी सेवानगर नई दिल्ली 110003
9990005904 9717631876
सोमवार, 30 मई 2011
मोबाइल के सीने में भी दर्द है। हां..............
मोबाइल का दर्द
बहुत लंबा हो गया जब इंतजार
आ गया मैं तार पर होकर सवार
खूब इज्जत थी मेरी भी शान थी
मेरी ट्रिन-ट्रिन भी सुरीली तान थी
था बदन बेकार सा काला कलूटा
दीखता था मैं तुम्हें अच्छा अनूठा
मैं पधारा जब तुम्हारे द्वार पर
हो गया लट्टू तुम्हारे प्यार पर
मान में चौकी किसी ने खाट दी
हर पड़ौसी ने मिठाई बांट दी
तुम से ज्यादा थे पड़ौसी साथ मेरे
ले लिए हों जैसे मुझसे सात फेरे
आ गया हूं, मैं नये अवतार में
अब नहीं जुड़ता किसी भी तार में
रह रहा हूं जेब में या हाथ में
अब मजा आता है यूं हर बात में
साथ देता हूं तुम्हारा हर कदम
तुम नहीं हो मेरे सच्चे हमकदम
खोपड़ी के बाल अपने नोच लो
एक शिकवा है हमें अब सोच लो
खूब उंगली पर नचाया था जिसे
अब अंगूठा क्यों दिखाते हो उसे
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शुक्रवार, 18 मार्च 2011
होली पर एक राज़ की बात। जानना चाहोगे ?
क्यों लगाते हैं गुलाल, होली में
बहुत पुरानी कहानी है; राजा हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सगाई राजस्थान में बाड़मेर राज्य के एक अतिसुंदर नौजवान राजकुमार ईलोजी से तय कर दी। राक्षस जैसे सुंदर होने चाहिए वैसे ही थे, ईलोजी। खरबूजे जैसे गाल, आम की फांक जैसी आंखें, भैंसे जैसा शरीर, मटके का सा पेट और बेडौल शरीर का मालिक। राजकुमारी होलिका ईलोजी के इसी रूप पर मोहित हो गयी थी।
ईलोजी भी काली-कलूटी होलिका की सुंदरता का वर्णन सुनकर बेहद प्रभावित हो गया और शादी करने को राजी हो गया था। होलिका तपस्विनी भी थी। उसने तपस्या द्वारा अपना प्रभाव इतना बढ़ा लिया था कि उसका भाई हिरण्यकशिपु भी उसका बहुत सम्मान करता था और बड़ी-बड़ी राजनैतिक उलझनों में उससे सलाह लिया करता था। होलिका को बस एक ही दुख था। उसका रंग बिलकुल काला था। इसके विपरीत ईलोजी बेडौल पर, गोरा था। इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए होलिका ने अग्नि की उपासना की और अग्नि देवता से अग्नि जैसा दहकता और दमकता हुआ रूप मांगा। अग्नि देवता ने प्रसन्न होकर होलिका को वरदान देते हुए कहा- ‘ तुम जब चाहोगी, अग्नि-स्नान कर सकोगी और अग्नि-स्नान के बाद एक दिन और एक रात के लिए तुम्हारा रूप अग्नि के समान जगमगाता रहेगा’। अब तो होलिका की मौज आ गयी थी। वह नगर के चौक पर चंदन की चिता में बैठकर रोज अग्नि-स्नान करने लगी। इससे होलिका का रूप चलती-फिरती बिजली सा चमकने लगा था। ईलोजी अपनी भावी दुल्हन की तपस्या और रंग-रूप से बेहद प्रभाविता हो चुके थे।
वसंत ऋतु में होलिका ईलोजी के विवाह का दिन निश्चित हो गया था। ईलोजी दूल्हा बनकर बारात लेकर होलिका से विवाह के लिए चल दिये। बारात आनन्द-उत्सव मनाती, नाचती-गाती दुल्हन के घर पहुंचने वाली थी। इधर ये बारात आने वाली थी, उधर राजा हिरण्यकशिपु एक झंझट में फंस गया था। उसका अपना बेटा राजकुमार प्रह्लाद विद्रोही को गया था और उसके महान शत्रु विष्णु का भक्त बन बैठा था। एक ओर उसकी दुलारी बहन का विवाह और दूसरी ओर उसके अपने बेटे का विद्रोह तथा विष्णु के छल-बल से परेशानी का डर। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से सलाह ली। होलिका.... मैं प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास कर चुका, लेकिन वह हर बार बच जाता है। इधर तुम्हारे विवाह में दो दिन शेष बचे है और बारात भी आने ही वाली है... मैं सोचता हूं, इस मंगल कार्य में प्रह्लाद के कारण कोई विघ्न न उत्पन्न हो जाए। भाई की परेशानी भांप कर होलिका बोली भइया... अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं आज शाम को जब अग्नि-स्नान करूंगी तो प्रह्लाद को भी गोद में लेकर बैठ जाऊंगी। सांप भी मर जायेगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। होलिका भाई की परेशानी को खत्म करने के चक्कर में ये भी भूल गयी कि अग्नि में प्रवेश से न जलने और सुरक्षित निकलने का वरदान सिर्फ अकेली के लिए था। किसी को साथ लेकर अग्नि-स्नान से क्या हो सकता है, इसके बारे में सोच ही नहीं रही थी। बस यही भूल उसकी मौत का कारण बन गयी। प्रह्लाद तो सुरक्षित बच गया पर होलिका जलकर राख हो गयी।
होलिका दहन के अगले ही दिन बारात दरवाजे पर आ पहुंची।
ईलोजी ने जब सुना कि होलिका अग्नि-स्नान करते समय जल मरी है, तो उसे बड़ा दुख हुआ। वे पागल से होकर होलिका की ठंडी चिता के पास जा पहुंचे और अपने दूल्हा वेश पर ही होलिका की राख हो मलने लगे और मिट्टी में लोट-पोट होने लगे। ईलोजी का सारा शरीर, मुंह और कपड़े राख में सन चुके थे। बारातियों ने उस पर पानी डालकर उसे धोने का प्रयास किया लेकिन ईलोजी नहीं माने और राख-मिट्टी में लोट-पोट होते रहे। ईलोजी का यह पागलपन देखकर बारातियों और नगर वासियों ने उसका मजाक बनाना शुरू कर दिया और हंसने लगे। किसी ने उसे रसिया कहा और उसके गले से फूलों की माला निकाल कर जूतो की माला डाल दी। ईलोजी ने अपनी प्रेमिका होलिका की याद में सब कुछ सहा और आजीवन कुंआरे रहने की कसम ले ली। तभी से ईलोजी फागुन के देवता कहलाने लगे। र्इलोजी के विवाह और होलिका दहन की याद में आज भी लोग होलिका दहन करते हैं। अगले दिन ईलोजी के साथ होने वाले हंसी मजाक को भी दोहराया जाता है। हां इतना जरूर है, राख के स्थान पर गुलाल का प्रयोग होने लगा है और पानी के स्थान पर रंग प्रयोग किया जाने लगा है।
राजस्थान में तो कई शहरों, गांव और कस्बों में आम चौराहों पर ईलोजी की प्रतिमाएं भी बैठाई जाती हैं और उन्हें दूल्हे की तरह सजाने और संवारकर रंग-गुलाल से पोतने की प्रथा है। ईलोजी हंसी-मजाज के प्रतीक बन गये हैं। राजस्थान में इनके नाम पर ईलोजी मार्किट, ईलोजी सर्किल, ईलोजी मार्ग और ईलोजी चौक से स्थानों का नामकरण कर उनको सम्मान दिया जाता है। ईलोजी के ही रूप में राजस्थानी रसिये दूल्हे के वेश में सजकर रंग-गुलाल से सने घोड़ी या गधे पर बैठकर धुलैंहडी के दिन गली चौराहों पर घूमते रहते हैं।
( साभार--- ऐतिहासिक कथाएं )
शनिवार, 12 मार्च 2011
हिन्दी साहित्य निकेतन, परिकल्पना और नुक्कड़डॉटकॉम ने कमाल कर दिया

जी हां , हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए एक सकारात्मक कदम हिन्दी साहित्य निकेतन के साथ शिखर की ओर बढ़ चला है। विवरण जानने के लिए और अपनी राय व्यक्त करने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए। जानकारी का खजाना खुलेगा। कहा जा रहा है कि यह मील का पत्थर बनेगा। पर मेरा मानना है कि यह मीलों लंबी चट्टान बनेगी। हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम युग की शुरूआत हो चुकी है।