रविवार, 31 मई 2009

व्‍यंग्‍य लेख -------------- हरिभूमि में प्रकाशित

है कोई माई का लाल
अब इसे चुटकुला कहें या रोचक घटना। सुना है अमेरिका में एक चोर पकड़ने वाली मशीन बनाई गयी। उसने अमेरिका में एक घंटे में 70 चोर पकड़े। आस्ट्रेलिया वालों ने उसे चैक किया तो हैरान रह गये क्योंकि उनके यहां उसने एक घंटे में ही 90 चोर पकड़ डाले। चीन ने भी उसे आजमाया और पाया कि मशीन हर घंटे सौ-सौ चोर पकड़ रही है। विदेशियों की ये तरक्की देख कर भारत में भी मशीन मंगवाने की योजना बनाई गयी। योजना बनी और मशीन आ भी गयी। पर ये क्या.....आते ही मशीन गायब। काफी खोजबीन के बाद पता चला कि मशीन चोरी हो गयी। अब मशीन को चोर नहीं छोड़ना चाहता और मशीन, चोर को। दोनों एक दूसरे को पकड़े हुए हैं और जकड़े हुए हैं। न मशीन मिल रही, न चोर। विचित्र स्थिति पैदा हो गयी है। इससे भी ज्यादा विचित्र ये है कि कोई भी इस मशीन को ढूंढ़ना नहीं चाहता है। मैं भी नहीं। बता रहा हूं.... बचपन में एक दिन मैंने पड़ोसी के दूध की मलाई चुरा कर खाई थी। मेरी उस गरम दूध से उंगलियां भी जल गयीं थीं। पिटाई हुई मेरे ही एक साथी की। समझ गये? मैं उस भेद को क्यों खुलने दूं? साथी की नाराजगी क्यों मोल लूं । दूसरा नंबर है मेरी बीवी का। वह भी इस मशीन को तलाशना नहीं चाहती क्योंकि उसने भी तीस साल पहले मेरा दिल चुराया था। सिर्फ दिल ही नहीं उसने तो मुझे पूरे को ही चुरा लिया था। उसे भी डर है कि कहीं मशीन उस मशीन-चोर को छोड़कर उसे ही न पकड़ ले। तीसरा नंबर है देश की पुलिस का, जो समाज में कानून व्यवस्था कायम करती है। लेकिन हमारी भारतीय पुलिस समझदार है, क्यों फटे में पांव डाले। आप सब जानते हैं। क्यों मुझसे सच्चाई से पर्दा हटवाना चाहते हो। मैं आप ही से पूछता हूं ..... है कोई, जो अचोर हो? देश का सौभाग्य है कि देश के लीडरान, प्रदेशों के मुखिया भी इस केस में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। वरना कौन बचता लीडरी को? देश लीडर विहीन हो जाता। कौन शर्मसार करता गिरगिट को? रंग बदलने में लीडरों ने ही तो गिरगिट का एकाधिकार तोड़ा है।
मशीन न रिश्‍वत लेती न शिफारिश मानती और देश की जेलें वैसे ही फुल हैं। सब मन ही मन वैज्ञानिको को कोस रहे हैं कि, कुछ ज्यादा ही खतरनाक मशीन बना डाली है। इतने खतरनाक तो परमाणु हथियार भी नहीं हैं। कायदे से तो वैज्ञानिकों को ऐसी मशीन ईजाद करनी चाहिए जिससे शरीफ आदमियों को पकड़ा जा सके। न जाने कब, कोई शरीफ आदमी खतरा पैदा कर दे और मशीन को ढूंढ़ने का बीड़ा उठा ले। मैंने अपने अड़ोस-पड़ोस में ढिंढोरा पिटवा दिया है कि, आये कोई माई का लाल सामने, जो इस बेशकीमती मशीन को तलाशने की चुनौती स्वीकार करे, और उस मशीन-चोर की जान बचाने का शुभकार्य संपन्न करे तथा मशीन द्वारा स्वयं के पकड़े जाने से न डरे। मैंने ऐसा कर तो दिया है लेकिन अब सभी मोहल्ले वाले कन्नी काटने लगे हैं। मुझे देखते ही सब लोग कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उन्होंने मुनादी सुनी ही न हो। पाठकों, है कोई मुनादी सुनने वाला?
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बुधवार, 27 मई 2009

गर्मी का असर

निर्जल नदिया हो गयी सूख गये सब कूप
मारी मारी फिर रही विचलित प्‍यासी धूप

गर्मी के हथियार से सूरज करता चोट
सिकुड़ सिकुड़ छाया छुपै ले तरूवर की ओट

सास बहू पर कर रही जो निर्मम अन्‍याय
धूप धरा पर मारती कस कस कोड़े हाय

पत्‍ता पत्‍ता तप रहा चढ़ता ताप असीम
शीतल कैसे हों भला क्‍या चंदन क्‍या नीम

शनिवार, 16 मई 2009

नर में वो बात कहां..... जो वानर में है।

एक दिन नई दिल्‍ली स्‍टेशन के प्‍लेटफार्म दो पर पलवल शटल में बैठा मैं गाड़ी चलने का इंतजार कर रहा था। प्‍लेटफार्म एक पर भी एक गाड़ी चलने के लिए तैयार खड़ी थी। तभी अचानक एक जोरदार धमाके के साथ एक बंदर दोनों गाडि़यों के बीच वाली लाइन पर आकर गिरा। ध्‍यान से देखा तो पता चला कि ये बंदर महाशय पच्‍चीस हजार वोल्‍ट के सप्‍लाई वाले खंबे पर चढ़ गये और झुलस कर आ गिरे हैं।
देखते ही देखते बंदरों का हुजूम इकठ्ठा हो गया। छोटे बंदर कांप भी रहे थे। तभी अचानक प्‍लेटफार्म एक वाली गाड़ी चली गयी। उसके बाद का नजारा तो देखने लायक था। जो बंदर उस घायल बंदर को नहीं देख पा रहे थे और बेहद गुस्‍से में थे। सच में उन दर्शक बंदरों का गुस्‍सा देखते ही बनता था। प्‍लेटफार्म एक के शेड के ऊपर बैठे बंदर वहां लगे एनाउंसमैंट स्‍पीकर की आवाज भी नहीं सहन कर पा रहे थे, उनका साथी जो घायल पड़ा था। नतीजा ये हुआ एक बुजुर्ग सा बंदर आया और उसने स्‍पीकर की तार का खींचना शुरू किया और तब तक खींचता रहा जब तक स्‍पीकर की तार टूट नहीं गयी। स्‍पीकर शांत हुआ तो बंदर का थोड़ा गुस्‍सा शांत हुआ। इसी बीच रेलवे लाइन पर पड़े उस घायल बंदर तो बंदरों के हुजूम ने घेर लिया था और किसी भी आदमी को पास नहीं फटकने दे रहे थे। तभी अचानक मेरी गाड़ी भी चल पड़ी और मैं आगे क्‍या हुआ होगा, नहीं देख पाया।
जाते जाते एक विचार बार बार मन में घुमड़ रहा था ... काश इंसान इस बड़े शहर में इन बंदरों से कुछ सीख ले। मुझे एक शेर याद आता है शायद ये महान शायर बशीर बद्र का है, हो सकता है गलत भी हो, भूल सुधार कर लेना।

लगता है शहर में नये आये हो
रूक गये जो हादसा देखकर

मेरा तो यही विचार है कि शहरी संस्‍कृति में अपनत्‍व कहीं खो गया है।
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शनिवार, 9 मई 2009

बीत गया वो जमाना

डाकिया आता था

एक थैला लाता था

मोहल्‍ला जुटता था

जिज्ञासा और आशा

के बीच हरेक आनंदित होता था

डाकिया पता पूछता तो हर कोई

घर तक छोड़ आने को तैयार होता था

अपने आप को धन्‍य समझता था

आज

पहली बात तो डाकिया नहीं आता

कोरियर आता है

वह पता पूछता है

तो कोई नहीं बताता

पड़ोस में कौन रहता है

कोई नहीं जानता

खुश होना तो दूर की बात है

सच में ये खुशियां दूर चली गयीं हैं

अब न डाकिया है, न उसका इंतजार है

शहरीकरण जो हो गया है


कोरियर वाला आता है
उसे डाकिया का दर्जा कतई नहीं दिया जा सकता


मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

एक और व्‍यंग्‍य लेख हरिभूमि में प्रकाशित

भर दे परचा

आज मेरा मित्र अविनाश, फिर एक मुस्कुराहट के साथ प्रकट हुआ और बोला, यार.. मैं चाहता हूं कि तू चुनाव लड़ ले। प्रधानमंत्री की कुर्सी का सवाल है। मैंने कहा मैं तुझसे लड़ सकता हूं पर चुनाव नहीं। अखबार का कवर पेज दिखाते हुए बोला, देख...आठ उम्मीदवारों की फोटो के साथ छपा है, उनकी संपत्ति का ब्यौरा। पता है... तेरह सौ निन्यानवे करोड़। अरे कुछ समझ ले... तेरे घर बारिश होगी तो फुहार मेरे तक भी तो आएगी। हम भी बहती गंगा में नहा धो लेंगे। भागीरथ ने तो पुरखों को तारा था, हम अपनी पुश्‍तों को तार देंगे। मैं तो कहता हूं मान जा और भर दे परचा। मैंने कहा प्यारे, इतनी ऊंची उड़ान मत भर, कहीं सूरज की गर्मी पंख न जला दे। एक बार को चल मैं तेरी मान भी लूं तो परचे में क्या भरूंगा? लाखों करोड़ों के गहने मेरे पास नहीं, नकद पैसा मेरे पास नहीं, बैंक लॉकर नहीं, मेरे ऊपर कोई हत्या का केस नहीं, गबन का केस नहीं, सच्चे तो छोड़, झूठा इल्जाम भी नहीं। कोठी बंगले मेरे पास नहीं। तू बता पर्चे की बेइज्जती कराएगा? पर्चा ही मेरी खिल्ली उड़ाएगा। मेरी मान तू अखबार पढ़ना और चैनल देखना कुछ दिन के लिए बंद कर दे। दिल ठिकाने आ जाएगा। ये जो चुनाव हो रहे हैं ये शगल मेला है। दूर बैठकर मजा ले। नेताओं के दोगले चरित्र देख। एक दूसरे को उनकी चुनावी नाव में सुराख कर डुबाना चाहते हैं। खुद भी भ्रष्‍टाचार में आकंठ डूबे हैं। तू इन हाथियों की लीद तोलकर उनकी खुराक का अंदाजा मत लगा, वरना बेमतलब बोझ मरेगा। इनकी पूंछ भी कट चुकी है और सूंड़ भी। बिना सूंड़ के हाथी से शर्म और हया कोसों दूर रहती हैं। महावत इनका कोई है नहीं। देखता नहीं जूता प्रचलन में क्यों आया है। जब देखो चल जाता है। कभी सोचा? जो पहले नहीं चलता था अब क्यों चलने लगा। चलने लगा और उछलने भी लगा। अमेरिका वाले भी ईर्ष्‍या करेंगे और कहेंगे कि भारत को हमारी नकल नहीं करनी चाहिए। इसका पेटेंट तो हमें ही मिला है। अभी तो मंदी की मार झेल रहा है। होश आयेगा तो जरूर बोलेगा। अभी कुछ दिन पहले ओले पड़े थे। सबने पसीने सुखाए होंगे और वाह वाह करी होगी। इन ओलों की गर्मी से किसान को कितने पसीने आ रहे हैं, ये जानने की किसे फुरसत है? जिनके घर पैसों की फसल उगती हो उन्हें रबी की फसल से क्या लेना। मेरे दोस्त, जिस दिन ये लोग समझ जाएंगे कि कफन में जेब नहीं होती.. सारा धन दौलत इनको मिट्टी नजर आयेगा। तब देश ही नहीं संसार सुधर जाएगा।................................................................
पी के शर्मा1/12 रेलवे कालोनी सेवानगर नई दिल्‍ली 110003

रविवार, 5 अप्रैल 2009

एक और व्‍यंग्‍य लेख ' हरिभूमि ' में प्रकाशित हो चुका है।

बड़ी सोच और बड़ी नोच


आज मेरा मित्र अविनाश, उछलता हुआ आता दिखाई दिया। मैं समझ गया, उछलने की उम्र तो है नहीं, पर आज फिर कोई गलत फहमी हो गयी होगी। आते ही बोला, पता है... हमारे देश का जो काला धन विदेशा बैंको में जमा है वह भारत आने वाला है। देश की गरीबी दूर हो जाएगी। मैंने कहा, ख्वाब देखना बुरा नहीं है पर बुरे ख्वाब देखना तो अच्छा नहीं है। क्यों इतने बुरे-बुरे ख्वाब देखता है। उन लोगों के दिल से पूछो जिन्होंने इस देश की खाल नोच-नोच कर ये ब्लैक मनी बनाई और भिजवाई है। देश को नोचना सबके बस की बात नहीं। कोई बड़ा मकसद रहा होगा। बड़े आदमियों की बड़ी सोच और बड़ी नोच।
अच्छा एक बात बता, पाकिस्तान के नवाज शरीफ सउदी अरब में रहे, बेनजीर इंग्लैंड में रहीं, हमारे देश के बड़े भी अगर बड़ी मुसीबत में फंस जाएं तो कहां जाएंगे और क्या खाएंगे। हमारे देशवासी विदेश में भीख मांगे... अच्छा लगता है क्या। देश की इज्जत का भी तो खयाल रखना है। देश का धन, सो अपना धन। भाई रे... ये अपनत्व की भावना है। ज्यादा खुश मत हो, खुश होना आम आदमी के हिस्से आया ही नहीं है। तू आम ही है जो चूसने का नहीं, चुसने का अधिकार रखता है।
इकाई, दहाई और सैंकड़ा से निकल कर अभी हजार यानि चैथे आंकड़े तक ही पहुंच पाया है तू। पूरे साल की पगार जोड़ेगा तो छटवें तक मुश्‍िकल से पहुंच पायेगा। इन बड़ी-बड़ी रकमों की तरफ देखेगा तो सर को इतना उठाना पड़ेगा कि अपनी ही टोपी गिरा लेगा। गणित फिर से पढ़ना पड़ेगा। गिनती दुबारा सीखनी होगी। सन् 2007 में करीब चैदह पद्म पच्चिस नील रुपये स्विस बैंक में जमा थे। अब सन् 2009 में एक संख तो हो ही गये होंगे। बोल....खबर गई सर के ऊपर से, या समझ गया कुछ ? ये संख मंदिर में बजने वाले और नील कपड़ों वाला नहीं है। अब गिनती दुबारा मत सीख लेना वरना तकलीफ होगी। वैसे मुझे विश्‍वास है कि तू इतना बड़ा तो नहीं हुआ है कि भारतीयता को इतनी जल्दी भूल जाए।
मेरी माने तो, इस बात से भी खुश मत हो कि उन लोगों की लिस्ट आउट हो जाएगी जो स्विस बैंकिये हैं। उन लोगों पर थूकने का भारतीय जनता को कोई अधिकार नहीं मिला है। वैसे न नो मन की तीयल होगी और न राधा नाचेगी। तूने अगर ऐसा करने की ठान भी रखी है तो आइडिया पोस्पोण्ड कर दे, कहीं ऐसा न हो कि कोई स्विस खाताधारी तेरी पान सुपारी दे बैठे। मेरी माने तो इस बात पर गर्व कर कि स्विस बैंकियो में भारतीय टॉप पर हैं। टॉप पर रहना भी शान की बात है, है न ?



पी के शर्मा
1/12 रेलवे कालोनी सेवानगर नई दिल्ली 110003
011, 24622733 मो, 9990005904
pawanchandan@gmail.com

गुरुवार, 26 मार्च 2009

एक व्‍यंग्‍य हरिभूमि में प्रकाशित

बड़े बड़ों का हाजमा



मेरा एक मित्र हैरान परेशान सा अखबार लहराते हुए कमरे में दाखिल हुआ और मेज पर पटकते हुए बोला....... लो..... कर लो, गल। रिश्‍वत और वो भी दो करोड़ की। हद हो गयी मुंह फाड़ने की। ऐसा भी नहीं कि गलती से ज्यादा फट गया हो। एक तुम और हम हैं, जो इमानदारी से चूल्हे में फूंक मार-मार कर परेशान हैं और चूल्हा है कि सुलगता ही नहीं। लोगों को इतना ईं..धन मिल जाता है कि भाड़ भभक रहे हैं। लगता है हम तुम पीछे हैं और जमाना ज्यादा ही आगे निकल गया, नहीं भागे जा रहा है।

मैंने उसके उबाल को कॉफी पिलाकर शांत किया और समझाया......
मेरे यार, ये हाई स्टेटस का मसला है। उपायुक्त हैं, वो भी राजधानी के नगर निगम के। पद की गरिमा नहीं रखनी क्या.....। पद को देखते हुए रकम ज्यादा नहीं है। अब तुम चाहो उपायुक्त दो कोड़ी का होकर रह जाए...। पुराने जमाने में कोड़ी 20 को कहते थे। उपायुक्त 20 रू के लिए हाथ फैलाएगा...। ऐसा कैसे हो सकता है?

मेरे प्रश्‍नीय वक्तव्य सुनकर उसे फिर से उबाल आने लगा था। उसके इस नये उबाल में मुझे हर्षद मेहता का नाम तैरता नजर आ रहा था। वही पुराना किस्सा याद कर पूछने लगा....हैसियत की ही बात थी तो उस शेयर दलाल पर एक करोड़ देने का आरोप क्यों उछला था, एक अरब का क्यों नहीं? उपायुक्त की हैसियत तो उस मामले के मुकाबले, पासंग भी नहीं है।

मैंने अपने दिमाग की फिर घुण्डी घुमाई और मित्र को एक बात और समझाई....जमाना बदल रहा है, आदमी की तरह पैसे की कीमत भी गिर रही है। लगता है.... देखते सुनते नहीं हो..... आदमी और शेयर मार्किट का सेंसैक्स कब गिर जाए... कुछ पता है? मंदी का दौर है। दूसरों के लाखों करोड़ों देखकर तू क्यों थर्मामीटर से बाहर जा रहा है? मैं तो कहता हूं, आइसक्रीम की तरह ठंडा रहना और जमना सीख ले। नहीं मानता तो...तेरे लिए कटोरा मंगवा देता हूं..... ले जा... और भीख... ले।

अरे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदले तो चलता है, पर तरबूज को देखकर खरबूजा कैसे गुजारा करेगा? तू अपनी औकात देख... अगले की है...तो है। बड़े लोगों का हाजमा है...। मेरे भाई.... पराये तंदूर की भभक देखकर तू तो मत सुलग। जा.... और अपने काम से काम रख। आज ड्यूटी नहीं जाना क्या?

और अविनाश वाचस्‍पति को मुंह लटकाये जाते हुए देखना मुझे दर्दनाक लग रहा था।