सोमवार, 29 अक्टूबर 2007

ये संदू संदू क्या है : संदेश उर्फ एस एम एस उर्फ संदू

एस एम एस के लिए लघु सांकेतिक शब्द बनाने की दिशा में भी काम किया जाए ताकि उसका प्रचलन आम और व्यवहार में एस एम एस का स्थान ले सके। संदू से मैं इसे तलाशने की शुरूआत करता हूं। ये संदू संदू क्या है ये संदू संदू । एस एम एस का लघु रूप है संदू, सुन लो बंधु, प्यारे बंधु, मेरे बंधु, अपने बंधु।



एस एम एस, संदू, संदेश

गये गये गये गये

पहाड़ गिर गये
चतुर्वेदी मर गये
कविता छोड़ गये
मुंह मोड़ सो गये

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2007

रातबहार का बंदा

चौखट से दिखता है चंदा
है वो रातबहार का बंदा





दिखती है मनचाही छवि
चेहरा है चमकदार अभी

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2007

Blogarama - The Blog Directory

फुर्सत नहीं है

हम बीमार थे
यार-दोस्त श्रद्धांजलि
को तैयार थे
रोज़ अस्पताल आते
हमें जीवित पा
निराश लौटे जाते

एक दिन हमने
खुद ही विचारा
और अपने चौथे
नेत्र से निहारा
देखा
चित्रगुप्त का लेखा

जीवन आउट ऑफ डेट हो गया है
शायद यमराज लेट हो गया है
या फिर
उसकी नज़र फिसल गई
और हमारी मौत
की तारीख निकल गई
यार-दोस्त हमारे न मरने पर
रो रहे हैं
इसके क्या-क्या कारण हो रहे हैं

किसी ने कहा
यमराज का भैंसा
बीमार हो गया होगा
या यम
ट्रेन में सवार हो गया होगा
और ट्रेन हो गई होगी लेट
आप करते रहिए
अपने मरने का वेट
हो सकता है
एसीपी में खड़ी हो
या किसी दूसरी पे चढ़ी हो
और मौत बोनस पा गई हो
आपसे पहले
औरों की आ गई हो

जब कोई
रास्ता नहीं दिखा
तो हमने
यम के पीए को लिखा
सब यार-दोस्त
हमें कंधा देने को रुके हैं
कुछ तो हमारे मरने की
छुट्टी भी कर चुके हैं
और हम अभी तक नहीं मरे हैं
सारे
इस बात से डरे हैं
कि भेद खुला तो क्या करेंगे
हम नहीं मरे
तो क्या खुद मरेंगे
वरना बॉस को
क्या कहेंगे

इतना लिखने पर भी
कोई जवाब नहीं आया
तो हमने फ़ोन घुमाया
जब मिला फ़ोन
तो यम बोला. . .कौन?
हमने कहा मृत्युशैय्या पर पड़े हैं
मौत की
लाइन में खड़े हैं
प्राणों के प्यासे, जल्दी आ
हमें जीवन से
छुटकारा दिला

क्या हमारी मौत
लाइन में नहीं है
या यमदूतों की कमी है

नहीं
कमी तो नहीं है
जितने भरती किए
सब भारत की तक़दीर में हैं
कुछ असम में हैं
तो कुछ कश्मीर में हैं

अधिकांश भारत की राजधानी में
ब्लू लाईन सरपट दौड़ा रहे हैं
जो सामने आ रहा है
उसी को निपटा रहे हैं
किसी के घर नहीं
जा पा रहे हैं
इसीलिए आपके घर
नहीं आ रहे हैं

जान लेना तो ईज़ी है
पर क्या करूँ
हरेक बिज़ी है

तुम्हें फ़ोन करने की ज़रूरत नहीं है
अभी तो हमें भी
मरने की फ़ुरसत नहीं है

मैं खुद शर्मिंदा हूँ
मेरी भी
मौत की तारीख
निकल चुकी है
मैं भी अभी ज़िंदा हूँ।

शनिवार, 20 अक्टूबर 2007

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2007

नेक सलाह

सपने अपने न हुए चाहे जितने देख
किसी तरह मिटते नहीं ये किस्मत के लेख

ख़्वाबों में खुशियाँ मिलें ले लो हाथ बढ़ाय
न जाने किस मोड़ पर कष्ट खड़ा मिल जाय